एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। राजपाल यादव(Rajpal Yadav) को चेक बाउंस मामले में 16 फरवरी को अंतरिम जमानत दे दी गई। एक्टर ने अपनी भतीजी की शादी अटेंड करने के लिए अर्जी दी थी। 12 दिन तिहाड़ जेल में बिताने के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने 18 मार्च, 2026 तक उनकी अंतरिम जमानत मंजूर की। उन्होंने 5 फरवरी को सरेंडर किया था।
केस में अब तक क्या हुआ?
बिजनेसमैन माधव गोपाल अग्रवाल (Madhav Gopal Agarwal) ने उनके खिलाफ केस फाइल किया था। अदालत के फैसले के बाद, अभिनेता के वकील भास्कर उपाध्याय (Bhaskar Upadhyay) ने लंबे समय से चले आ रहे विवाद की शुरुआत और सालों में इस पर क्या-क्या हुआ, इसके बारे में विस्तार से बात की है।
राजपाल के वकील ने बताया कि ये मामला राजपाल यादव की फिल्म के प्रोडक्शन से जुड़ा है जब उन्होंने अता पता लापता (Ata Pata Laapata) के लिए 5 करोड़ रुपये उधार लिए थे।
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शिकायतकर्ता के साथ हुआ था समझौता
हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों पक्षों ने पहले एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके बाद अगस्त 2012 तक तीन सप्लीमेंट्री एग्रीमेंट हुए। लेटेस्ट अपडेट के मुताबिक राजपाल यादव ने बिजनेसमैन को पांच चेक जारी किए थे, जिन्हें दिसंबर 2012 से इनकैश करना था। लेकिन 2012 में एक म्यूजिक लॉन्च इवेंट में स्थिति बिगड़ गई जिसमें अमिताभ बच्चन भी मौजूद थे।
माधव गोपाल अग्रवाल क्या चाहते थे?
वकील ने कहा-“सितंबर में अमिताभ बच्चन फिल्म के म्यूजिक लॉन्च इवेंट में आए थे और शिकायतकर्ता उनके साथ स्टेज शेयर करना चाहते थे। राजपाल की टीम ने इसके लिए मना कर दिया क्योंकि बच्चन अपनी उपस्थिति के लिए कोई एहसान नहीं ले रहे थे। इससे शिकायतकर्ता नाराज हो गए। उन्होंने उस समझौते के आधार पर सितंबर 2012 में दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की और अपने बकाया भुगतान होने तक फिल्म पर रोक लगाने की मांग की। मामला दिसंबर 2012 तक खिंचता रहा, जब उन्होंने 60,60,350 रुपये का पहला चेक जमा किया, जिसे स्वीकार कर लिया गया।”
2016 में कितनी राशि बकाया थी?
इसके बाद 2016 में एक नया सहमित पत्र साइन हुआ। इसके अनुसार इसे किसी भी पक्ष द्वारा चुनौती नहीं दी जा सकती थी। इसके अनुसार 10.40 करोड़ रुपये की राशि बकाया थी। शिकायतकर्ता ने एक वचन पत्र पर हस्ताक्षर किए थे कि यदि उक्त राशि उन्हें वापस कर दी जाती है तो पिछले समझौतों को पुनर्जीवित नहीं किया जाएगा। उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि इस राशि की वसूली केवल एक्जीक्यूशन के माध्यम से ही की जानी चाहिए।
इसके बाद 2016 में एक्जीक्यूशन पिटीशन (निष्पादन याचिका) दायर की गई और शिकायतकर्ता को 1.90 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। शेष राशि के लिए एक अन्य गारंटर, अनंत दत्ताराम आगे आए जिनके दस्तावेज कथित तौर पर प्रकाशन के पास उपलब्ध हैं। हालांकि, शिकायतकर्ता ने कथित तौर पर जमानत लेने से इनकार कर दिया।
राजपाल ने मांगा था एक महीने का समय
भास्कर बताते हैं, “उन्होंने अपनी 15 करोड़ रुपये की संपत्ति को जमानत के रूप में पेश किया और राशि लौटाने के लिए एक महीने का समय मांगा। वो सरप्राइज्ड रह गए जब शिकायतकर्ता ने इसे लेने से इनकार कर दिया और डिक्री के अनुपालन के लिए राजपाल जी को जेल भेजने की मांग की। एक्जीक्यूशन अधिकारी ने इसे लिखित में दर्ज किया और कहा कि चूंकि एक्जीक्यूशन का कोई अन्य तरीका सुझाया नहीं गया है, इसलिए निष्पादन प्रक्रिया बंद कर दी गई।”
2018 में इस मामले ने एक नया मोड़ लिया। वकील के अनुसार, एक्जीक्यूशन कार्यवाही के दौरान, शिकायतकर्ता ने तीसरे सप्लिमेंट्री एग्रीमेंट के चेक फिर से जारी करवा लिए, जिसे सहमति समझौते के बाद रद्द कर दिया जाना चाहिए था।
मार्च 2018 में निचली अदालत ने राजपाल को दोषी ठहराया और उन पर 11.5 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया। उसी वर्ष नवंबर में, एक्जीक्यूशन कोर्ट ने भास्कर द्वारा बताए गए उसी कारण के लिए उन्हें तीन महीने की कैद की सजा सुनाई।
वकीलों के बदलने का भी पड़ा असर?
राजपाल की कानूनी टीम ने 2019 में इस आदेश को चुनौती दी थी। हालांकि, भास्कर का दावा है कि वकीलों के बदलने से मामले में कॉम्पलिकेशन पैदा हो गए। भास्कर ने बताया, “नए न्यायाधीश ने कहा कि उन्हें इसमें कोई दम नहीं दिखता और राजपाल जी के वकील ने स्वीकार किया कि अगर उन्हें मध्यस्थता का मौका दिया जाए तो वे रकम चुकाने को तैयार हैं। अदालत ने अपनी टिप्पणी में यह बात लिख दी।”
उन्होंने आगे कहा कि इस घटनाक्रम के कारण मामला अभी भी लंबित है। लेटेस्ट जानकारी के अनुसार, राजपाल की टीम ने अदालत से उनके तर्कों को विस्तार से सुनने और मामले का फैसला उसके गुणों के आधार पर करने का अनुरोध किया है।
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