आतंकवाद कम, नशा बढ़ा, सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए चुनौती।
रोहित जंडियाल, जम्मू। सुरक्षाबलों की सख्ती के बाद आतंकवाद को बढ़ावा देने में विफल रहे पाकिस्तान ने अब यहां नशे को बढ़ावा दे रहा है। सीमा पार से लगातार हो रही नशे की तस्करी के कारण जम्मू यहां के ग्रामीण व शहरी दोनों ही क्षेत्र नशे से पीड़ित है।
यही कारण है कि लाखों युवा यहां पर नशे की दलदल में फंसे हुए हैं। समाजशास्त्री, चिकित्सक और नशामुक्ति केंद्रों से जुड़े पेशेवर आम तौर पर इस मुद्दे को सुरक्षा, सामाजिक व स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से देखते हैं। उनका कहना है कि आतंकवाद का खतरा जरूर कम हुआ है लेकिन नशे का खतरा समांतर बना हुआ है।
एक सर्वे के अनुसार जम्मू-कश्मीर में विभिन्न आयु वर्ग के दस लाख से अधिक लोग नशे से पीड़ित हैं।आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि 2023 में हालात इस कदर बदतर थे कि इंस्टीट्यूट आफ हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस कश्मीर में हर मिनट एक से ज़्यादा नशा करने वाले व्यक्ति भर्ती हुए जबकि जीएमी जम्मू के नशामुक्ति केंद्र में भी भर्ती होने वालों की संख्या बढ़ी है।
दक्षिण कश्मीर में आसानी से मिल जाती है ड्रग्स
अधिकारियों का कहना है कि दक्षिण कश्मीर में ड्रग्स आसानी से मिल जाती हैं। आतंकवाद में शामिल होने वाले भी अधिकांश युवा दक्षिण कश्मीर से हैं। इसलिए पुलिस के लिए आतंकवाद की तरह ही ड्रग्स भी बड़ी चुनौती हैं। नशे से भी कई लोगों की जान ले ली है। अधिकतर ड्रग्स सीमा पार और पंजाब से लाई जाती हैं।
जम्मू-कश्मीर में तीन दशकों से भी अधिक समय से नशे के खिलाफ काम कर रहे राकेश ठाकुर कहते हैं कि कश्मीर और जम्मू दोनों ही जगहों पर नशा बढ़ा है। यहां पर नशे पर राेक लगाने के लिए अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। उनका कहना है कि यह ही कोई जानता है कि आतंकवाद पर मुंह की खाने के बाद पाकिस्तान ही यहां पर नशे को बढ़ावा दे रहा है।
आतंकवाद कम हुआ, लेकिन खतरा बदला है
कश्मीर पर पैनी नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार सैयद अमजद शाह का कहना है कि इसमें कोई दोराय नहीं है कि आतंकवाद कम हुआ, लेकिन खतरा बदला है।आतंकवाद पर कड़ा दबाव बना है, मगर ड्रग तस्करी और नशे का नेटवर्क समानांतर चुनौती बन गया है।तस्करी से होने वाली कमाई का इस्तेमाल असामाजिक व अवैध गतिविधियों में हो सकता है।वे सीमा-पार तस्करी के एंगल और स्थानीय स्तर पर छोटे माड्यूल्स की ओर इशारा करते हैं।
कई वषों तक विभिन्न अस्पतालों में सेवाएं दे चुके डा. राजिंद्र थापा का कहना है कि यह स्वास्थ्य और मानसिक-सामाजिक संकट भी है। उनका कहना है कि लंबा तनाव, बेरोज़गारी, और भविष्य की अनिश्चितता युवाओं को नशे की ओर धकेल सकती है।पाकिस्तान इसी का लाभ उठा रहा है।
इस पर सख्ती करने की जरूरत है। रेडक्रास के नशा मुक्ति केद्र की प्रभारी मंजरी सिंह का कहना है कि हेरोइन के साथ-साथ ओपियाड और सिंथेटिक ड्रग्स के मामले बढ़े हैं।उनका कहना है कि युवाओं में नशे की समस्या गंभीर चिंता का विषय है। यह सिर्फ कानून-व्यवस्था नहीं, बल्कि पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी है जिसमें इलाज, काउंसलिंग और पुनर्वास की जरूरत है।
केवल सख्ती नहीं, रोकथाम और पुनर्वास की भी जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल सख्ती नहीं, रोकथाम और पुनर्वास की भी जरूरत है। उनका कहना है कि जम्मू और कश्मीर पुलिस की कड़ी कार्रवाई के तहत संपत्ति कुर्की, सप्लाई चेन तोड़ने के प्रयास हो रहे हैं। अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। उनका कहना है कि स्कूल-कालेज स्तर पर नियमित जागरूकता कार्यक्रम होने चाहिए। स्वास्थ्य विभाग, पुलिस और सामाजिक संगठनों के बीच डेटा-शेयरिंग व संयुक्त रणनीति पर काम होना चाहिए।सीमावर्ती इलाकों में निगरानी और टेक्नोलाजी का इस्तेमाल बढ़ाने की सलाह भी दी।
अधिकांश कश्मीरी विशेषज्ञ मानते हैं कि आतंकवाद पर शिकंजे के साथ-साथ नशे के खिलाफ दोहरी रणनीति चाहिए। सप्लाई चेन पर सख्त कार्रवाई के साथ मांग घटाने के लिए इलाज, पुनर्वास और रोजगार-कौशल के अवसर उत्पन्न् होने चाहिए। |
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