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हिम्मत ने लिखी नई मिसाल, मशीनों के सहारे परीक्षा देने पहुंची 17 वर्षीय कनिष्का बिष्ट।
मोहित पांडे्य, चंडीगढ़। “पापा, मेरा पेपर छूटना नहीं चाहिए…” अस्पताल के बेड पर पड़ी 17 वर्षीय कनिष्का बिष्ट ने जब यह बात कही, तो पिता की आंखें भर आईं। दस दिन तक बेहोशी, तेरह दिन आईसीयू में जिंदगी से जंग, सीने में जकड़ा निमोनिया और शरीर से जुड़ी मशीनें। इन सबके बीच भी उसका इरादा साफ था। हालात चाहे जैसे हों, वह 12वीं की बोर्ड परीक्षा देगी।
शुक्रवार को फिजिक्स का पेपर चल रहा है। व्हीलचेयर पर बैठी कनिष्का, आक्सीजन सपोर्ट और जरूरी मेडिकल उपकरणों के साथ परीक्षा केंद्र पहुंची। यह दृश्य देख वहां मौजूद हर व्यक्ति उसकी हिम्मत को सलाम करता नजर आया।
कनिष्का सेक्टर-26 स्थित खालसा स्कूल की 12वीं (नाॅन-मेडिकल) की छात्रा है। उसका परीक्षा केंद्र मनीमाजरा के सरकारी स्कूल में बनाया गया है। पिता प्रेम सिंह ने बताया कि कुछ दिन पहले साधारण खांसी-जुकाम हुआ था, लेकिन कफ जमने से हालत बिगड़ती गई और निमोनिया हो गया।
स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि आईसीयू में भर्ती करना पड़ा। दस दिन तक उसे होश नहीं था और 13 दिन आईसीयू में गुजारने पड़े। बचपन से दिव्यांग कनिष्का पहले ही कई चुनौतियों का सामना कर चुकी है, लेकिन इस बार बीमारी ने उसे बुरी तरह तोड़ने की कोशिश की। डॉक्टरों ने आराम की सलाह दी थी, मगर उसने परीक्षा देने का निर्णय नहीं बदला।
अस्पताल प्रशासन और स्कूल प्रबंधन ने विशेष व्यवस्था की। अस्पताल से डॉक्टरों की टीम उसके साथ परीक्षा केंद्र पहुंची, ताकि किसी भी आपात स्थिति से निपटा जा सके। परीक्षा कक्ष में भी अलग से व्यवस्था की गई।
कनिष्का की यह जंग सिर्फ बीमारी से नहीं, बल्कि परिस्थितियों से भी है। मशीनों के सहारे परीक्षा देने के लिए पहुंचना आसान नहीं था, लेकिन उसने साबित कर दिया कि हौसले के आगे मुश्किलें छोटी पड़ जाती हैं।
परीक्षा केंद्र के बाहर खड़े अभिभावकों और शिक्षकों के बीच एक ही चर्चा थी। यह बेटी सच में मिसाल है। बीमारी भले शरीर को कमजोर कर दे, लेकिन मजबूत इरादों को नहीं। कनिष्का की कहानी यही संदेश देती है कि सपनों की राह में बाधाएं आएंगी, मगर हिम्मत हो तो हर चुनौती को पार किया जा सकता है। |
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