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प्रिंस कुमार, दरभंगा । ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में फरवरी 2020 में विश्वविद्यालय सिंडिकेट का चुनाव तीन वर्षों के कार्यकाल के लिए हुआ था, लेकिन कार्यकाल समाप्त होने के तीन साल बाद भी अब तक दूसरा चुनाव नहीं कराया गया।
यह स्थिति केवल चुनाव टलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे विश्वविद्यालय की सर्वोच्च कार्यकारी संस्था की वैधानिकता और निर्णय प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
नियमों के अनुसार सिंडिकेट विश्वविद्यालय के प्रशासनिक, वित्तीय और नीतिगत फैसलों की रीढ़ मानी जाती है। विश्वविद्यालय अधिनियम और परिनियमों के मुताबिक, सिंडिकेट सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्षों की निर्धारित अवधि के लिए होता है।
फरवरी 2020 में गठित सिंडिकेट का कार्यकाल फरवरी 2023 में ही समाप्त हो गया था। इसके बाद नया चुनाव कराना अनिवार्य था, ताकि विश्वविद्यालय की निर्णय प्रक्रिया लोकतांत्रिक और पारदर्शी बनी रहे।
लेकिन हैरानी की बात यह है कि कार्यकाल समाप्त हुए लगभग तीन साल बीत चुके हैं, फिर भी न तो चुनाव की घोषणा हुई और न ही इसकी कोई स्पष्ट समय-सीमा तय की गई।
विश्वविद्यालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 की धारा 22(1) के अंतर्गत 01 फरवरी 2020 से तीन वर्षों की अवधि के लिए सिंडिकेट सदस्यों का निर्वाचन किया गया था। जिनमें, सिंडिकेट के लिए निर्वाचित शिक्षण संवर्ग में डा. प्रेम मोहन मिश्र, डा. अशोक कुमार मेहता चुनें गए थे।
सहायक प्राध्यापक, लेक्चरर वर्ग में, डा. अमर कुमार, डा. दयानंद पासवान को चुनाव किया गया था। वहीं, गैर-शिक्षण संवर्ग में इम्तेयाज शौकत, पूर्व विधायक डा. फैयाज अहमद, बैद्यनाथ चौधरी बैजू, डा. धनेश्वर प्रसाद सिंह और सुजीत पासवान का नाम शामिल हैं।
सिर्फ निर्वाचित सदस्य ही नहीं, बल्कि सरकार और राजभवन द्वारा नामित सिंडिकेट सदस्यों का तीन साल का कार्यकाल भी समाप्त हो चुका है। सामान्यतः नामित सदस्यों की नियुक्ति सरकार और कुलाधिपति के स्तर से की जाती है ताकि प्रशासनिक और शैक्षणिक संतुलन बना रहे।
लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि पुराने नामित सदस्यों का कार्यकाल खत्म होने के बावजूद सिंडिकेट के लिए नए नामांकन नहीं किए गए हैं। सूत्रों के अनुसार, चुनाव न होने के पीछे प्रशासनिक उदासीनता, सरकार और राजभवन के बीच समन्वय की कमी तथा विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से समय पर प्रस्ताव न भेजा जाना जैसे कारण बताए जा रहे हैं।
हालांकि, इन कारणों को लेकर अब तक कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। जिससे शिक्षक संगठनों, कर्मचारी संघों और छात्र प्रतिनिधियों में असंतोष का वातावरण तैयार हो रहा है।
विश्वविद्यालय की स्वायत्तता पर सवाल
शिक्षाविदों का मानना है कि सिंडिकेट जैसे संवैधानिक निकाय का लंबे समय तक रिक्त या अपूर्ण रहना विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को कमजोर करता है।
बजट अनुमोदन, नई नियुक्तियां, शैक्षणिक सुधार और विकास योजनाओं जैसे अहम निर्णय या तो टल जाते हैं या सीमित दायरे में लिए जाते हैं, जिससे संस्थान की प्रगति प्रभावित होती है।
अब बड़ा सवाल यह है कि जब तीन साल का कार्यकाल तय था, तो छह साल बाद भी नया सिंडिकेट क्यों नहीं बना। निर्धारित कार्यकाल समाप्त होने के तीन साल बाद भी पुराने सदस्य ही निर्णय ले रहे हैं तो इसकी कितनी वैधानिकता है। |