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विकास योजनाओं और आध्यात्मिक केंद्रों से इतिहास से जुड़ रहा वर्तमान। जागरण
जितेन्द्र पाण्डेय, सिद्धार्थनगर। पिपरहवा (कपिलवस्तु) अब केवल एक पुरातात्विक स्थल नहीं, बल्कि सिद्धार्थनगर की वैश्विक पहचान को नई ऊंचाई देने वाला ऐतिहासिक और आध्यात्मिक केंद्र बनता जा रहा है। वर्ष 1898 में यहां की खोदाई तत्कालीन अंग्रेज जमींदार डब्ल्यूसी पेपे द्वारा कराई गई थी, जिसमें प्राप्त भगवान बुद्ध से जुड़े बहुमूल्य अवशेष इंग्लैंड भेज दिए गए थे।
लगभग 125 वर्षों बाद 30 जुलाई को इन धरोहरों की भारत वापसी ने पूरे क्षेत्र में नया गर्व और उत्साह भर दिया है। वर्तमान में ये अमूल्य अवशेष दिल्ली के राय पिथौरा स्थित प्रदर्शनी में प्रदर्शित हैं, जहां देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंच रहे हैं।
पिपरहवा भगवान बुद्ध की क्रीड़ास्थली मानी जाती है और यह जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 28 जनवरी को सिद्धार्थनगर महोत्सव में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि पिपरहवा से बुद्ध अवशेष विदेश पहुंचने के बाद लंबे समय तक उनका उचित सम्मान नहीं हो सका। उन्होंने बताया कि ताइवान में इन धरोहरों की नीलामी की स्थिति बनी थी, जिसे सांसद के प्रयास और सरकार के हस्तक्षेप से रोका गया और इन्हें वापस लाया गया।
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि सरकार कपिलवस्तु में विपश्यना केंद्र विकसित कर रही है, जहां आवासीय व्यवस्था और अन्य विकास कार्य तेजी से चल रहे हैं। इससे पिपरहवा का आध्यात्मिक महत्व और भी गहरा हो गया है।
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तीन माह पूर्व उप मुख्यमंत्री केशव मौर्य पिपरहवा के पावन अवशेषों को प्रदर्शनी के लिए रूस के काल्मिकिया नगर लेकर गए थे, जिससे इस धरोहर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली। बुद्ध की करुणा, शांति और सत्य की खोज से जुड़ी यह पावन धरती आज इतिहास और वर्तमान को जोड़ते हुए विश्व मानचित्र पर अपनी अलग छाप छोड़ रही है।
बढ़ रहा सार्क देशों के श्रद्धालुओं का आगमन
पवित्र कपिलवस्तु की धरती पर सार्क देशों से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। भगवान बुद्ध से जुड़ी इस ऐतिहासिक धरोहर के प्रति लोगों की आस्था वर्ष दर वर्ष गहरी होती जा रही है। वर्ष 2024 में सार्क देशों से लगभग 13 हजार 700 श्रद्धालु स्तूप दर्शन के लिए पहुंचे, जबकि भारतीय श्रद्धालुओं की संख्या 38 हजार 236 रही।
इसी अवधि में बिम्सटेक देशों से 1 हजार 820 तथा अन्य विदेशी देशों से 2 हजार 90 पर्यटक दर्शन के लिए आए। वर्ष 2025 में भी यह क्रम जारी रहा। सार्क देशों से आने वाले दर्शकों की संख्या बढ़कर 16 हजार 85 हो गई, जबकि 31 हजार 25 भारतीय श्रद्धालुओं ने कपिलवस्तु पहुंचकर श्रद्धा अर्पित की। बिम्सटेक देशों से 1 हजार 459 और अन्य देशों से 805 लोगों ने इस पावन स्थल पर आकर अपनी आस्था व्यक्त की।
पिपरहवा की ऐतिहासिक विरासत केवल सिद्धार्थनगर ही नहीं, बल्कि पूरे देश की अमूल्य धरोहर है। पर्यटन सुविधाओं के विस्तार और संरक्षण कार्यों के माध्यम से इसे विश्वस्तरीय पहचान दिलाने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है। -
-शिवशरणप्पा जीएन, जिलाधिकारी |
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