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झारखंड निकाय चुनाव: सत्तारूढ़ गठबंधन में दरार, झामुमो-कांग्रेस-राजद में नहीं तालमेल

deltin33 3 hour(s) ago views 508
  

गठबंधन के कार्यकर्ताओं और मतदाताओं में असमंजस की स्थिति।



प्रदीप सिंह, रांची। झारखंड में निकाय चुनाव भले ही दलीय आधार पर नहीं हो रहे हों, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपने-अपने समर्थित प्रत्याशियों के पक्ष में खुलकर ताकत झोंक दी है।

सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के बीच अपेक्षित तालमेल नहीं बन पाया है। कई नगर निकायों में तीनों दलों ने अलग-अलग प्रत्याशियों को समर्थन दे दिया है, जिससे गठबंधन की डोर ढीली पड़ती नजर आ रही है।

राजधानी रांची में मेयर और वार्ड पार्षद पदों को लेकर मुकाबला रोचक और जटिल बन गया है। यहां गठबंधन सहयोगी दलों के समर्थित उम्मीदवार आमने-सामने हैं।

साझा रणनीति के अभाव में कार्यकर्ताओं के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है। एक ओर दल सार्वजनिक मंचों से गठबंधन की मजबूती और एकजुटता की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर अलग-अलग सभाएं, जुलूस और प्रचार अभियान चल रहे हैं।

कई वार्डों में स्थिति यह है कि एक ही मोहल्ले में गठबंधन के अलग-अलग घटक दलों के समर्थक मतदाताओं से अपने-अपने प्रत्याशी के लिए समर्थन मांग रहे हैं। इससे कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है।
जिलों में भी दिखा अलग-अलग रुख

रांची ही नहीं, बल्कि अन्य नगर निकायों में भी यही तस्वीर उभरकर सामने आई है। बोकारो, धनबाद, हजारीबाग और गिरिडीह जैसे शहरी क्षेत्रों में गठबंधन दलों के बीच प्रत्याशी चयन को लेकर सहमति नहीं बन सकी।

स्थानीय स्तर पर नेताओं ने अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन और समीकरणों को ध्यान में रखते हुए अलग निर्णय लिए। निकाय चुनाव भले ही गैर दलीय हों, लेकिन ये आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों की तैयारी के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

ऐसे में हर दल अपने संगठन को मजबूत करने और जनाधार को परखने का मौका नहीं छोड़ना चाहता।
कार्यकर्ताओं में असमंजस से मतदाताओं में उलझन तय

गठबंधन की इस ढीली होती डोर का असर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी पड़ सकता है। कई जगहों पर कार्यकर्ता खुलकर यह स्वीकार कर रहे हैं कि उन्हें स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं मिल पाए हैं। कुछ स्थानों पर तो कार्यकर्ता दो खेमों में बंटे नजर आ रहे हैं।

मतदाताओं के बीच भी यह सवाल उठ रहा है कि जब राज्य स्तर पर गठबंधन कायम है तो स्थानीय स्तर पर तालमेल क्यों नहीं दिख रहा? यह स्थिति विपक्षी दलों को हमला बोलने का मौका दे सकती है।

गठबंधन के शीर्ष नेता सार्वजनिक मंचों से तो एकजुटता का संदेश दे रहे हैं और इसे स्थानीय स्तर की स्वायत्तता का मामला बता रहे हैं।

उनका तर्क है कि निकाय चुनाव स्थानीय मुद्दों पर आधारित होते हैं और यहां उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि अधिक महत्वपूर्ण होती है। हालांकि, जमीनी हकीकत यह संकेत दे रही है कि समन्वय की कमी भविष्य में बड़े चुनावों के लिए चुनौती बन सकती है।
निकाय चुनाव बाद टूटेगा गठबंधन?

यही स्थिति बनी रही तो गठबंधन के भीतर विश्वास और तालमेल को लेकर सवाल और गहरे हो सकते हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व राज्य सरकार के पूर्व मंत्री केएन त्रिपाठी ने तो यहां तक कह डाला है कि चुनाव के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा और भाजपा तालमेल कर सरकार बनाएगी।

हालांकि कांग्रेस के प्रमुख नेताओं ने इसे उनका व्यक्तिगत विचार बताते हुए खुद को अलग कर लिया है। बहरहाल, निकाय चुनाव के नतीजे यह तय करेंगे कि गठबंधन की यह ढील अस्थायी है या किसी बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत।

फिलहाल इतना तय है कि इस चुनाव ने झारखंड की सियासत में हलचल बढ़ा दी है और गठबंधन की मजबूती को लेकर नए सिरे से सवाल खड़े कर दिए हैं।
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