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विक्रमशिला सेतु: मौत की रस्सी पर लटकती किसानों की जिंदगी, जान जोखिम में डालकर काटते घास

deltin33 1 hour(s) ago views 208
  

रस्सी के सहारे पुल से नीचे उतरता किसान



शिवम सिंह, नवगछिया (भागलपुर)। विक्रमशिला सेतु पर रोज नजर आने वाला खतरनाक मंजर किसी एक्शन फिल्म के स्टंट से कम नहीं है, मगर यह कड़वी हकीकत है। भागलपुर-नवगछिया के दर्जनों किसान रोजी-रोटी के लिए 35-40 फीट ऊंचे पुल से मोटी रस्सी के सहारे गंगा किनारे उतरते हैं।

न तो ये आर्मी जवान हैं, न पेशेवर स्टंटबाज। दरांती, बोरा और अन्य सामान लटकाए ये मजबूर किसान मौत के साथ रोज खेलने को विवश हैं। पुल की रेलिंग या किनारे के पेड़ों से रस्सी बांधकर वे नीचे घास काटने जाते हैं। मवेशियों के लिए चारे की किल्लत और नदी किनारे आसान उपलब्धता से किसान यह गैरकानूनी व असुरक्षित रास्ता चुनते हैं। हादसा के बावजूद ये किसान अपने जीविका के लिए मौत से खेलते रहते हैं।

उल्लेखनीय है कि बीते मंगलवार इस जोखिम भरे \“शार्टकट\“ ने एक परिवार की खुशियां छीन लीं। इस्माइलपुर थाना क्षेत्र के पश्चिमी भिट्ठा निवासी 40 वर्षीय रंजीत यादव घास काटने पुल की रेलिंग से रस्सी बांधकर उतर रहे थे।

अचानक रस्सी टूट गई और वे 40 फीट नीचे गिर पड़े। गंभीर रूप से घायल रंजीत को नाविकों व ग्रामीणों ने तुरंत मायागंज अस्पताल पहुंचाया, मगर डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। नाविक बताते हैं, रोज सैकड़ों यही करतब करते हैं, मना करने पर भी नहीं मानते।
छोटे बच्चों को भी बांस के डंडे या जाल में बिठाकर नीचे उतारते हैं

खतरे की भयावहता यहीं नहीं थमती। कई किसान छोटे बच्चों को बांस के डंडे या जाल में बिठाकर 40-45 फीट नीचे उतारते हैं। महिलाएं-पुरुष चंद मिनटों में ही नीचे पहुंच जाते हैं। मगर हर पल हादसे का साया मंडराते रहता है।

गंगा किनारे उगी हरी घास मवेशियों के चारे का एकमात्र सहारा बनी हुई है। रंजीत की मौत ने खतरे को फिर उजागर किया, मगर प्रथा थमने का नाम नहीं ले रही है। ग्रामीणों का कहना है कि नाव सभी के पास नहीं है, न ही सुरक्षित वैकल्पिक रास्ता है। इस ओर प्रशासन का ध्यान नहीं है।
दैनिक जागरण अपील

बीते मंगलवार को इसी तरह का शार्टकट अपनाते समय रंजीत की मौत हो गई। यह मौत एक चेतावनी भी है कि किसान जानलेवा शार्टकट छोड़ दें। हमारा जीवन अनमोल है। मजबूरी में भी सावधानी जरूरी है।

कुछ पल की जल्दबाजी से पूरे परिवार को बेसहारा नहीं छोड़ा जा सकता। प्रशासन को भी इस देशा में कदम उठाना चाहिए। सीढ़ी या फिर नाव की वैकल्पिक व्यवस्था इन किसानों और पशुपालकों के लिए अनिवार्य रूप से होना चाहिए।
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