अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। सनातन भारतीय चिकित्सा परंपरा आयुर्वेद की वैज्ञानिक और जीवनोपयोगी समझ विकसित करने के लिए हर वर्ष बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईए) पहुंच रहे हैं। एशिया, यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका सहित विभिन्न देशों से आने वाले छात्र, शोधार्थी और चिकित्सा विशेषज्ञ आयुर्वेद को केवल उपचार पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की समग्र प्रणाली के रूप में समझने में गहरी रुचि दिखा रहे हैं।
जीवन को देता है सार्थक दिशा
वैश्विक स्तर पर जीवनशैली जनित रोगों, मानसिक तनाव और असंतुलन के बढ़ने के साथ आयुर्वेद की ओर आकर्षण लगातार तेज हुआ है। अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान के निदेशक प्रो. (वैद्य) प्रदीप कुमार प्रजापति ने बताया कि आयुर्वेद शरीर, मन और आत्मा के संतुलन पर आधारित चिकित्सा दर्शन प्रस्तुत करता है, जो आधुनिक जीवन की चुनौतियों के बीच लोगों को केवल स्वस्थ ही नहीं, बल्कि संतुलित, अनुशासित और सार्थक जीवन जीने की दिशा भी देता है।
अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली का मजबूत स्तंभ
बताया कि एआईआईए में विदेशी नागरिक पंचकर्म, आहार-विहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या और योग आधारित उपचार पद्धतियों का गहन अध्ययन कर रहे हैं। कई विदेशी प्रतिभागी यहां प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद अपने देशों में आयुर्वेदिक चिकित्सा, वेलनेस सेंटर और शोध गतिविधियों से जुड़ रहे हैं।
उन्होंने कहा कि आयुर्वेद की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता इस बात का प्रमाण है कि सनातन भारतीय ज्ञान परंपरा आज भी मानवता के लिए प्रासंगिक और मार्गदर्शक है। दावा किया कि एआइआइए अनुसंधान, शिक्षा और उपचार के माध्यम से आयुर्वेद को वैज्ञानिक आधार पर वैश्विक मंच प्रदान कर इसे अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली का मजबूत स्तंभ बना रहा हैं।
प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, सामंजस्य
प्रो. (वैद्य) प्रदीप कुमार प्रजापति ने बताया कि आयुर्वेद प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, सामंजस्य सिखाता है, पंचकर्म, प्राकृतिक चिकित्सा और जीवनशैली आधारित उपचार उन्हें यह एहसास कराते हैं। यहां आने वाले विदेशी आयुर्वेद को किसी वैकल्पिक पद्धति के रूप में नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और अनुभवजन्य ज्ञान के रूप में पा रहे हैं। अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान इसे आधुनिक संदर्भों में प्रस्तुत करने का काम कर रहा हैं।
अब तक 50 से अधिक विदेशी छात्र
आयुर्वेद बीमारी के उपचार से कहीं आगे बढ़कर स्वस्थ रहने की चेतना जाग्रत करता है। यही कारण है कि एआइआइए में अबतक ब्राजील, जर्मनी, अमेरिका, कनाडा व कोलंबिया आदि देशों के 50 से अधिक विदेशी छात्रों की आयुर्वेद के मूल दर्शन की समझ को विकसित कर चुके हैं।
इसी क्रम में अपने यहां कई विदेशी प्रतिभागी यहां प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद अपने देशों में आयुर्वेदिक चिकित्सा, वेलनेस सेंटर और शोध गतिविधियों से जुड़ रहे हैं। जो प्रमाणित करता है कि आयुर्वेद को लेकर ऋषि-मुनियों का प्रतिपादित यह विचार कि ‘स्वस्थ व्यक्ति ही समाज की सबसे बड़ी संपदा है’, आज वैश्विक स्वास्थ्य विमर्श का केंद्र बन चुका है।
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