LHC0088 • 1 hour(s) ago • views 335
माघी पूर्णिमा पर वाराणसी में उमड़ी भक्तों की भीड़, सूर्य-चंद्र योग ने बनाया विशेष फलदायी।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। माघी पूर्णिमा के अवसर पर सूर्य-चंद्र योग ने इस दिन को विशेष फलदायी बना दिया है। रविवार को सुबह 10 बजे तक लगभग दो लाख श्रद्धालुओं ने बाबा विश्वनाथ के दर्शन किए। माघी पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर काशी में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। भोर में मंगला आरती के साथ ही श्रीकाशी विश्वनाथ धाम में दर्शन-पूजन का सिलसिला प्रारंभ हुआ।
माघ मास की पूर्णिमा इस वर्ष विशेष पुण्यदायी संयोग लेकर आई है। माघी पूर्णिमा का स्नान, माघ महीने के स्नान, दान, व्रत और तप के सभी संकल्पों का समाहार माना जाता है। इस बार सूर्य और चंद्र के विशेष योग ने इसके धार्मिक महत्व को और बढ़ा दिया है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. विनय कुमार पांडेय के अनुसार, इस वर्ष माघी पूर्णिमा रविवार को पड़ी है।
पूर्णिमा तिथि के स्वामी चंद्रमा होते हैं, जबकि रविवार सूर्य का दिन माना जाता है। सूर्य और चंद्र का यह दुर्लभ योग अनंत पुण्य प्रदान करने वाला बताया गया है। प्रो. पांडेय ने बताया कि माघ मास की पूर्णिमा को माघी पूर्णिमा कहा जाता है, क्योंकि सामान्यत: इस दिन मघा नक्षत्र का योग रहता है।
प्रो. पांडेय के अनुसार, माघी पूर्णिमा को कलियुगादि तिथि के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यता है कि इसी तिथि से कलियुग का आरंभ हुआ था। इस वर्ष मघा नक्षत्र के स्थान पर पुष्य नक्षत्र का योग बन रहा है, जिसे शास्त्रों में अत्यंत शुभ माना गया है। पुष्य नक्षत्र में किए गए स्नान, दान और पूजन को अक्षय पुण्य फल देने वाला कहा गया है।
श्रद्धालुओं ने इस अवसर पर गंगा में स्नान कर पुण्य अर्जित किया और बाबा विश्वनाथ के दरबार में हाजिरी लगाई। श्रद्धालुओं की इस भीड़ ने काशी की धार्मिकता को और भी प्रगाढ़ किया। माघी पूर्णिमा का यह दिन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक एकता और श्रद्धा का प्रतीक भी है।
इस दिन श्रद्धालुओं ने अपने परिवार और मित्रों के साथ मिलकर पूजा-अर्चना की। काशी में इस दिन का विशेष महत्व है, जो न केवल धार्मिक आस्था को दर्शाता है, बल्कि भारतीय संस्कृति की गहराई को भी उजागर करता है। माघी पूर्णिमा का पर्व श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक बनकर उभरा है, जिसमें लाखों श्रद्धालुओं ने भाग लिया और अपने जीवन में पुण्य का संचार किया। |
|