अनिमेश मुखर्जी-
इला जोशी बहुत प्रतिभाशाली हैं। मतलब जितना लोग करना चाहते हैं, उतना इन्होंने कर के छोड़ दिया है। इंटरनेशनल बिज़नेस में काम किया और दुनिया घूमीं, ऑडियो शो प्रोड्यूस किए, जश्न ए रेख्ता के मुशायरे में गईं, डिस्कवरी की चैनल वॉइस बनीं, कमाल के टीवी शो लिखे और फ़िलहाल लोकलाइज़ेशन में नेटफ़्लिक्स और एमेज़ॉन वालों की चहेती हैं।
मगर ये इनकी सबसे बड़ी ख़ासियत नहीं है। इला जितनी मेहनत करती है, उतनी मेहनत करते मैंने कम ही लोगों को देखा है। हम बुकफ़ेयर के लिए दिल्ली में हैं और साथ में इनके दो शो का लोकलाइज़ेशन चल रहा है।
12 तारीख को हमारा दिन सुबह पाँच बजे शुरू हुआ। दिल्ली पहुँचे, बुक फ़ेयर में इवेंट अटेंड किया और उसके बाद वापस आकर काम निपटाया। फ़ाइनल डिलीवरी करते-करते 13 तारीख की सुबह के चार बज गए मतलब लगातार 23 घंटे काम करना फिर कुछ घंटे सोकर सुबह नौ बजे से फिर से काम शुरू करना। क्योंकि आज के काम भी आज ख़त्म करने थे और ऐसा कई दिन चलेगा। यही वजह है कि दिल्ली में मिलने की गुज़ारिश करने वाले तमाम लोगों को बुकफ़ेयर में ही मिल लेने की बात कहनी पड़ती है।

ख़ैर, मेरे लिए इला की सबसे बड़े खूबी है ख़याल रखना। ये ख़याल रखना बुनियादी बातों तक नहीं है। तमाम छोटी-छोटी चीज़ों के बारे में सोचना। जो भी अपने हैं, उनके बारे में एक एक्स्ट्रा मील जाकर कुछ करना। ये बात सबसे ज़्यादा सीखने वाली है और ईमानदारी से कहें, तो इसे सीखना बड़ा मुश्किल है। अपने कम्फ़र्ट ज़ोन में रहते हुए हम सब अपने करीबी लोगों के लिए कुछ कर सकते हैं, लेकिन उससे बाहर निकलकर कुछ करना, बड़ा मुश्किल होता है। मसलन, अपनी तमाम व्यस्तताओं के बीच में उसे मेरे काम के लिए उपस्थित रहना ही है।
यह प्यार बड़ी मुश्किल से मिलता है और मेरे लिए यह बड़ी नेमत है। इस तरह की बहुत सी चीज़ें है, जिनका ज़िक्र करना यहाँ सही नहीं होगा। हाँ, एक घटना है कि हम एक शो की मीटिंग के लिए कुछ बेहद ज़रूरी प्रेज़ेंटेशन बनाना था और इला ने अपने एक दोस्त को फ़ोन किया कि मदद कर दो। भाईसाहब बीमार थे और अकेले थे। इला फिर उसे लेकर हॉस्पिटल गई, रात भर हम वहाँ रुके, साथ-साथ प्रेज़ेंटेशन पूरा किया। सुबह उसके घर वाले आ गए। तब हम अपनी मीटिंग में गए।
|