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शाहजहानाबाद की खामोश दीवार सुनाएगी क्रांति की शौर्य गाथा, मोरी गेट और दिल्ली गेट का हो रहा जीर्णोद्धार

Chikheang 1 hour(s) ago views 418
  

दिल्ली की ऐतिहासिक दीवार 1857 की पहली क्रांति की शौर्य गाथा सुनाएगी।



शशि ठाकुर, नई दिल्ली। वक्त की धूल फांक रही दिल्ली की ऐतिहासिक दीवार पहली क्रांति की शौर्य गाथा सुनाएगी। शाहजहानाबाद की प्राचीन दीवार (कश्मीरी गेट) जिसने सदियों से सल्तनतों को बनते- बिगड़ते देखा और 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम की भीषण हमलों को अपने सीने पर झेला। वह अब नए अवतार में जीवंत होने जा रही हैं।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और कार्पोरेट सोशल रिस्पान्सिबिलिटी (सीएसआर) पहल के तहत कश्मीरी गेट का सुंदरीकरण किया जा रहा है। इसके बाद मोरी गेट और दिल्ली गेट का सुंदरीकरण किया जाएगा।
रंग- बिरंगी रोशनी से जगमग होगी पुरानी दीवार

एएसआई अधिकारियों के अनुसार इस ऐतिहासिक स्थल पर लाल किले की तर्ज पर लाइट एंड साउंड शो शुरू करने की योजना है। जिसमें 1857 की क्रांति की शौर्य गाथा को आधुनिक तकनीक के जरिए दीवारों पर जीवंत किया जाएगा। हालांकि, वर्तमान में परियोजना अपने अंतिम चरण में है।

कश्मीरी गेट की दीवारों जमी काई और परिसर में गंदगी के ढेर को साफ कर गेट को नया रूप दिया जा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक बिजली कनेक्शन मिलते ही और पीछे की दीवारों की ऊंचाई बढ़ाने और परिसर में घास लगाने का काम पूरा होते ही इस वर्ष के मध्य तक पर्यटकों के लिए इसे खोल दिया जाएगा।
खंडहर से हेरिटेज हब तक का सफर

वर्ष 1835 में शाहजहां द्वारा निर्मित कश्मीरी गेट कभी कश्मीर जाने वाली राह का यह मुख्य द्वार क्रांति के दौरान ब्रिटिश तोपों के निशाने पर रहा। आज जहां महाराणा प्रताप बस टर्मिनल की गहमागहमी है। वहीं एएसआई इन दीवारों के पीछे शांति और सौंदर्य का एक द्वीप तैयार कर रहा है। गेट की असामाजिक तत्वों की सुरक्षा के लिए पूरे परिसर में लगभग 12 सीसीटीवी कैमरें लगाए गए है।
अगली बारी मोरी और दिल्ली गेट की

एएसआई के दिल्ली मंडल के अधीक्षण पुरातत्वविद् राजकुमार आनंद ने बताया कि यह अभियान केवल कश्मीरी गेट तक सीमित नहीं है। मोरी गेट और दिल्ली गेट पर भी जीर्णोद्धार का भी काम शुरू किया जाएगा। फिलहाल विभाग की रणनीति है कि कश्मीरी गेट पर दर्शकों की प्रतिक्रिया और जगह देखने के बाद ही अन्य ऐतिहासिक द्वारों पर भी इस तरह के शो का विस्तार किया जाए। पुरानी दिल्ली की ये दीवारें अब महज ईंट- पत्थर का ढांचा नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी विरासत से रूबरू होने का एक भव्य स्थान बनेंगी।

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