हरिद्वार में शताब्दी समारोह में सोमवार का दिन भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं को रहा समर्पित।
जागरण संवाददाता, हरिद्वार। शताब्दी समारोह में सोमवार का दिन भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं को समर्पित रहा। इस मौके पर आयोजित आदिवासी सम्मेलन में देशभर से आए 330 समूहों की परंपरा और संस्कृति का जीवंत संगम देखने को मिला।
शताब्दी समारोह के मंच पर उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, गुजरात, छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश समेत देश के विभिन्न अंचलों से आए आदिवासी-समष्टि के रक्षक स्वयंसेवकों ने जब अपनी पारंपरिक रंग-विरंगी वेशभूषा में लोकनृत्य प्रस्तुत किए तो पूरा पांडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
इन आदिवासी समूहों के प्रतिनिधियों को शांतिकुंज ने भूमि रक्षक, प्रकृति रक्षक और राष्ट्रक्षक के साथ भारत के प्रथम नागरिक की भी संज्ञा दी।
सम्मेलन के मुख्य अतिथि श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी के सचिव श्रीमहंत रविन्द्र पुरी महाराज ने कहा कि मूल संस्कृति, संस्कार, धर्म व समाज की मान्यता व परंपराओं को भूल जाने पर सभ्यताएं नष्ट हो जाती हैं। वर्षों से हो रहे धर्म परिवर्तन को रोकने में गायत्री परिवार की मेहनत प्रशंसनीय है।
श्रीमहंत ने आदिवासी भाई-बहनों को यह संज्ञा देते हुए कहा कि आदिवासी लोग किरात रूप में भगवान शिव के गण हैं। गायत्री परिवार का 80 देशों में सक्रिय मिशन भारतीय मूल के लोगों के परिवारों के बच्चों में संस्कारों को जगाने का कार्य किया जा रहा है।
गुजरात के महिसागर क्षेत्र के जनजातीय नृत्य, छत्तीसगढ़ के बस्तर की सशक्त लोक-परंपराएं, मध्य प्रदेश के आदिवासी नृत्य रूप, झारखंड के छोटा नागपुर अंचल और गढ़वाली नृत्य की विशिष्ट नृत्य-शैली ने उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया।
भारत सहित विश्व के 20 से अधिक देशों से आए गायत्री परिवारजन भी इस सांस्कृतिक उत्सव में भावविभोर होकर झूम उठे।
इस अवसर पर शताब्दी समारोह के दलनायक डा. चिन्मय पंड्या ने कहा कि आदिवासी समाज भारतीय संस्कृति की आत्मा है। उनकी जीवन शैली प्रकृति, परिश्रम और सामूहिक चेतना पर आधारित है, जो आज के भौतिकतावादी युग में मानवता को नई दिशा दे सकती है।
गायत्री परिवार आदिवासी समाज को न केवल संरक्षण, बल्कि सम्मान, सहभागिता और आत्मगौरव के साथ आगे बढ़ाने के लिए संकल्पित है।
महिला मंडल की प्रमुख शैफाली पंड्या ने महिला मंडल की ओर से आदिवासी क्षेत्रों में किए जा रहे जागरण, शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी प्रयासों की भी जानकारी दी।
इस अवसर पर देव संस्कृत विश्वविद्यालय की ओर से प्रकाशित पुस्तक संस्कृति संचार का विमोचन भी हुआ। उपस्थित स्वयंसेवकों की ओर से सत्संकल्प पाठ किया गया।
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