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साकेत कोर्ट ने पत्नी की हत्या के प्रयास में आरोपित पति को किया बरी, सबूतों के अभाव में मिला लाभ

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साकेत कोर्ट ने किया बरी। फाइल फोटो



जागरण संवाददाता, दक्षिणी दिल्ली। साकेत कोर्ट ने पत्नी की हत्या की कोशिश के आरोपित एक व्यक्ति को यह कहते हुए बरी कर दिया कि अभियोजन पक्ष अपने मामले को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। साथ ही मृतक की कथित बेवफाई का सिर्फ़ शक काफी नहीं था।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समर विशाल ने अभियोजन पक्ष के मामले में कमियों को उजागर किया। कहा शक चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता।

अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि आरोपित शिव कुमार ने तीन अगस्त 2019 को अपनी पत्नी सरस्वती पर हमला किया और उसे चाकू से घायल कर दिया था, क्योंकि उसे शक था कि वह पड़ोसी के साथ विवाहेतर संबंध में थी, जिसके कारण उनके बीच अक्सर झगड़े होते थे।

आरोपित के बेटे और बहुएं कथित तौर पर शोर सुनकर मौके पर पहुंचे और उससे हथियार छीनने में कामयाब रहे। जांच अधिकारी ने एक पेपर कटर जब्त किया था, जिसका इस्तेमाल कथित तौर पर हमले में किया गया था। कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही में विरोधाभासों की ओर भी इशारा किया।

हमले की कथित पीड़िता सरस्वती इस मामले में एक प्रमुख गवाह थी। उसने पुलिस को दिए गए अपने बयान से इनकार कर दिया, जिसमें उसने अपने पति को चोटों के लिए जिम्मेदार ठहराया था। उसने कोर्ट के सामने बिल्कुल अलग बयान दिया, जिसमें उसने कहा कि उसकी चोटें दुर्घटना से लगी थीं।

कोर्ट ने 17 जनवरी के अपने फैसले में कहा कि ऐसा लगता है कि उसने आरोपित को बचाने का फैसला किया है। अन्य गवाह भी अपने पिछले बयानों से मुकर गए। जज ने कहा कि पहले से जांचे गए पब्लिक गवाहों की गवाही की प्रकृति और गुणवत्ता को देखते हुए, मुझे लगता है कि अभियोजन केस का पूरा आधार ही खत्म हो गया है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष विश्वसनीय चश्मदीद गवाह की गवाही के अभाव में मेडिकल सबूतों को आरोपित के कामों से जोड़ने में विफल रहा है। अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि अपराध का मकसद आरोपित के इस विश्वास से उपजा था कि उसकी पत्नी उसके प्रति बेवफा थी।

हालांकि, कोर्ट ने कहा कि सिर्फ मकसद, भले ही उसे सच मान लिया जाए, सबूत की जगह नहीं ले सकता। संवैधानिक आदेश और आपराधिक कानून के अनुसार, अपराध को ठोस, विश्वसनीय और भरोसेमंद सबूतों से साबित किया जाना चाहिए।

संदेह, चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता। संदेह का लाभ देते हुए कोर्ट ने आरोपित को भारतीय दंड संहिता की धारा 307 के तहत हत्या के प्रयास के आरोप से बरी करने का आदेश दिया।

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