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शुष्क मौसम से घाटी के कई हिस्सों में जल संकट, सूखने लगे जल स्रोत; पानी को तरसे लोग

Chikheang 8 hour(s) ago views 197
  

लगातार शुष्क मौसम से घाटी में सूखने लगे जल स्रोत, लोग परेशान। सांकेतिक तस्वीर



जागरण संवाददाता, श्रीनगर। लगातार शुष्क मौसम और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव ने घाटी के कई हिस्सों में जल संकट पैदा हो गया है। जिससे प्रमुख नदियों, नालों और झरनों में जलस्तर में कमी आ गई है। परिणामस्वरूप पेयजल आपूर्ति योजनाओं पर गंभीर असर पड़ा है।

दक्षिणी कश्मीर के पुलवामा के नेवा में स्थित अरिपाल, नागबल और बुलबुल नाग सहित कई प्रसिद्ध और ऐतिहासिक नदी नाले या तो पूरी तरह सूख गए हैं या उनमें पानी का बहाव कम हो गया है। यह प्राकृतिक नदी-नाले लंबे समय से कई जल आपूर्ति योजनाओं की रीढ़ रहे हैं जो दक्षिण कश्मीर के हजारों घरों को पानी मुहैया कराते हैं और घाटी के अन्य क्षेत्रों में भी यही स्थिति है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि इन जल स्रोतों के सूखने से पूरे क्षेत्र के लोग पीने के पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जिससे विशेषकर महिलाओं और बच्चों को पानी की तलाश में लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है। स्थानीय निवासी लतीफ अहमद ने कहा कि अरीपाल झरना क्षेत्र के लिए जीवन रेखा था। कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन यह सूख जाएगा। जलवायु परिवर्तन और भीषण सूखे के कारण ऐसा हो रहा है।

लतीफ ने कहा कि अब वह टैंकरों पर निर्भर हैं, जो अनियमित और अपर्याप्त हैं झेलम और रामबियारा छोटी नदियों के किनारे भी स्थिति उतनी ही गंभीर है, जहां जलस्तर काफी गिर गया है। कई जिलों में फैली दर्जनों जल आपूर्ति योजनाएं इन स्रोतों से पानी लेती हैं, लेकिन पानी का प्रवाह कम होने के कारण कई योजनाएं आंशिक या पूरी तरह से ठप हो गई हैं।

पुलवामा के लितर इलाके के निवासी सैयद बशीर ने कहा कि रामबियारा में पानी की स्थिति इतनी खराब हो गई है कि पंपिंग स्टेशन ठीक से काम नहीं कर पा रहे हैं। कुछ मिनट के लिए ही पानी मिलता है, अगर मिलता भी है तो, और कभी-कभी तो कई दिनों तक पानी आता ही नहीं है।

संकट से निपटने के लिए अधिकारियों ने टैंकर सेवाएं शुरू कर दी हैं। हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि टैंकरों से बढ़ती मांग को पूरा करना संभव नहीं हो पा रहा है। कई इलाकों में टैंकर दो-तीन दिन में एक बार ही घरों तक पहुंचते हैं, जिससे लोगों की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं।

जिले के नेवा इलाके की निवासी यासमीन ने कहा कि एक टैंकर पूरे गांव की ज़रूरतें पूरी नहीं कर सकता। लोग कई दिन तक इंतज़ार करते हैं, और जब तक टैंकर आता है, लोग बाल्टियों और बर्तनों के साथ दौड़ पड़ते हैं। इससे अकसर झगड़े और अफरा-तफरी मच जाती है। निवासियों ने जलवायु परिवर्तन के घातक प्रभावों पर भी चिंता व्यक्त की और बताया कि क्षेत्र के पारंपरिक जल स्रोत अब भरोसेमंद नहीं रह गए हैं।

लोगों ने सरकार से जलसंकट से निपटने के लिए उचित उपाय करने का आग्रह किया है जिनमें वैकल्पिक जल स्रोतों का निर्माण, पारंपरिक झरनों का पुनरुद्धार, वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण तंत्र को मजबूत करना शामिल है।

एक अन्य स्थानीय निवासी मजीद मागरे ने कहा कि सरकार को भविष्य के लिए योजना बनानी चाहिए। अस्थायी टैंकर सेवाएं कोई समाधान नहीं हैं। हमें स्थायी जल स्रोतों की आवश्यकता है क्योंकि जलवायु परिवर्तन एक स्थायी समस्या है।

उधर, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि वर्तमान सूखा जारी रहता है और व्यापक राहत उपाय नहीं किए जाते हैं तो घाटी को आने वाले महीनों में गंभीर पेयजल संकट का सामना करना पड़ सकता है जिससे ग्रामीण और शहरी दोनों जनसंख्या प्रभावित होगी।

अधिकारियों ने जनता से फिलहाल पानी का विवेकपूर्ण उपयोग करने का अनुरोध किया है और कहा है कि वैकल्पिक स्रोतों पर विचार किया जा रहा है। संबंधित विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि वैकल्पिक स्रोतों पर विचार किया जा रहा है। मौसम विभाग ने आने वाले दिनों में वर्षा और बर्फबारी की संभावना जताई है। उम्मीद है कि ताजा बर्फबारी व वर्षा से जल संकट में सुधार होगा।
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