\“एक्स-कैडर\“ पदों और \“कूलिंग आफ पीरियड\“ पर जोन खुद बना सकेंगे नीति, यह अधिकार रेलवे बोर्ड ने दिए हैं।
अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज। भारतीय रेलवे ने प्रशासनिक कामकाज को सुगम बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। रेलवे बोर्ड ने यह अधिकार अब जोनल स्तर पर दे दिया है कि वे \“एक्स-कैडर\“ पदों पर तैनाती और उसके बाद अनिवार्य \“कूलिंग आफ पीरियड\“ (विश्राम अवधि) के नियम खुद तय कर सकते हैं। इससे जो कर्मचारी अपने मूल विभाग से बाहर \“एक्स-कैडर\“ पदों (जैसे विजिलेंस, ट्रेनिंग सेंटर या स्पेशल प्रोजेक्ट्स) पर जाते हैं, उनके लिए दोबारा आवेदन करने से पहले मूल विभाग में लौटने की अनिवार्य समय सीमा यानी \“कूलिंग आफ पीरियड\“ क्या होनी चाहिए इसे जोन खुद तय करेंगे।
ऐसे में जोन अपनी स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए खुद की नीति तैयार करेंगे। अब जोन तय करेगा कि किसी विशेष विभाग में काम करने के लिए कर्मचारियों की कितनी आवश्यकता है। यदि किसी विशेष पद के लिए अनुभवी लोगों की कमी है, तो जोन अपनी नीति के तहत \“कूलिंग आफ पीरियड\“ को कम कर सकता है, जिससे कर्मचारी जल्दी दोबारा सेवा देने के पात्र हो सकेंगे।
रेलवे में हर कर्मचारी का एक मुख्य विभाग होता है (जैसे इंजीनियरिंग, ट्रैफिक या मैकेनिकल)। लेकिन कुछ पद ऐसे होते हैं जो इन विभागों से अलग होते हैं, जैसे- सतर्कता विभाग, ट्रेनिंग सेंटर में टीचर बनना, स्पेशल प्रोजेक्ट्स आदि। इन पदों को \“एक्स-कैडर\“ पद कहते हैं।
यहां कर्मचारी कुछ समय के लिए काम करने जाता है और फिर अपने पुराने विभाग में लौट आता है। जबकि जब कोई कर्मचारी एक बार \“एक्स-कैडर\“ पद पर काम करके अपने पुराने विभाग में लौटता है, तो नियम के मुताबिक उसे कुछ समय (जैसे दो या तीन साल) अपने मूल विभाग में ही रहना पड़ता है। इस समय सीमा को ही \“कूलिंग आफ पीरियड\“ कहते हैं। इसके खत्म होने से पहले वह दोबारा किसी स्पेशल पोस्टिंग के लिए अप्लाई नहीं कर सकता था।
पहले इसके नियम बहुत कड़े थे और पूरे देश में एक जैसे थे। अब रेलवे बोर्ड ने कहा है कि जोन खुद फैसला लें। जोन अपनी जरूरत के हिसाब से यह तय कर सकता है कि यह \“कूलिंग आफ पीरियड\“ कितना होगा। जैसे उत्तर मध्य रेलवे को को लगता है कि उसे किसी स्पेशल प्रोजेक्ट के लिए अनुभवी लोगों की तुरंत जरूरत है, तो वह इस वेटिंग पीरियड (कूलिंग आफ) को कम भी कर सकता है। इससे अब फाइलों को बोर्ड के पास मंजूरी के लिए नहीं भेजना पड़ेगा।
रेलवे बोर्ड के उप-निदेशक स्थापना संजय कुमार ने इसके लिए उत्तर मध्य रेलवे महाप्रबंधक नरेश पाल सिंह समेत सभी जोनल रेलवे को पत्र भेज दिया है। पत्र में दो टूक बातें कही गई हैं-अगर कोई कर्मचारी किसी खास काम में एक्सपर्ट है, तो जोन उसे दोबारा जल्दी बुला सकेगा। हर जोन की अपनी समस्याएं होती हैं, अब वे अपनी जरूरत के हिसाब से नियम बना सकेंगे। आसान शब्दों में कहें तो रेलवे बोर्ड ने सेंट्रल रेलवे को “पावर“ दे दी है कि वे अपने कर्मचारियों को स्पेशल ड्यूटी पर भेजने और वापस बुलाने के नियम खुद तय करें, ताकि काम न रुके।
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