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दिल को सही रखने पर मंथन करते देशभर से आए हार्ट स्पेशलिस्ट।
जागरण संवाददाता, रांची। ड्रग-कोटेड बैलून एक विशेष प्रकार का एंजियोप्लास्टी बैलून होता है, जिसकी सतह पर दवा लगी होती है और इसका उपयोग शरीर की संकरी या ब्लाक हुई धमनियों को खोलने के लिए किया जाता है।
जब यह बैलून धमनी के अंदर फुलाया जाता है तो यह न केवल नस को फैलाकर ब्लाकेज को हटाता है। बल्कि उस पर लगी दवा सीधे धमनी की दीवार में पहुंच जाती है, जिससे कोशिकाओं की असामान्य वृद्धि रुकती है और भविष्य में दोबारा नस के सिकुड़ने (री-ब्लाकेज) की संभावना कम हो जाती है।
ड्रग-कोटेड बैलून का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें स्टेंट डालने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे शरीर में कोई स्थायी धातु नहीं रहती और नस की प्राकृतिक लचीलापन बनी रहती है।
इसके अलावा, लंबे समय तक ब्लड थिनर दवाइयां लेने की आवश्यकता कम हो सकती है, इंफेक्शन या स्टेंट-संबंधी जटिलताओं का जोखिम घटता है और भविष्य में यदि दोबारा इलाज की जरूरत पड़े तो विकल्प खुले रहते हैं।
यही कारण है कि ड्रग-कोटेड बैलून का उपयोग विशेष रूप से पैरों की धमनियों की बीमारी, स्टेंट के अंदर दोबारा ब्लाकेज होने की स्थिति और कुछ चुनिंदा हृदय रोग मामलों में प्रभावी और लाभकारी माना जाता है।
यह बातें लखनऊ के कार्डियोलाजिस्ट डा. मनीष झा ने शनिवार को होटल बीएनआर में आयोजित कार्डियोकान में कही। इस मौके पर चिकित्सकों ने हृदय रोग से जुड़ी बीमारी और उनके बेहतर इलाज पर व्याख्यान दिया।
पटना के डॉ. विकास सिंह ने बताया कि ट्राइग्लिसेराइड्स खून में मौजूद एक प्रकार की चर्बी (फैट) होती है और जब इसका स्तर बढ़ जाता है तो इसका सीधा और गंभीर असर शरीर पर पड़ता है, खासकर हार्ट और पैंक्रियाज पर।
बढ़े हुए ट्राइग्लिसेराइड्स हार्ट की धमनियों में चर्बी जमा होने की प्रक्रिया को तेज कर देते हैं, जिससे एथेरोस्क्लेरोसिस होता है यानी नसें सख्त और संकरी हो जाती हैं।
परिणामस्वरूप हार्ट अटैक, सीने में दर्द (एंजाइना), स्ट्रोक और ब्लड प्रेशर बढ़ने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है, विशेष रूप से जब साथ में एलडीएल कोलेस्ट्राल भी ज्यादा हो।
वहीं अगर ट्राइग्लिसेराइड्स बहुत ज्यादा बढ़ जाएं , तो यह पैंक्रियाज के लिए बेहद खतरनाक हो सकता है, क्योंकि इससे तीव्र पैंक्रियाटाइटिस हो सकता है, जो पैंक्रियाज की अचानक और गंभीर सूजन की स्थिति है।
इसमें तेज पेट दर्द, उल्टी, बुखार, और कभी-कभी जानलेवा जटिलताएं भी हो सकती हैं। ज्यादा ट्राइग्लिसेराइड्स अक्सर मोटापा, डायबिटीज, शराब का अधिक सेवन, तैलीय भोजन और शारीरिक गतिविधि की कमी से जुड़े होते हैं।
इसलिए समय रहते इसे नियंत्रित करना दिल और पैंक्रियाज दोनों की सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी होता है। इस मौके पर डा. दीपक गुप्ता, ङा. नीरज प्रसाद सहित अन्य राज्यों से आए कार्डियोलाजिस्ट मौजूद थे।
कैसे संभालें दिल: क्या कहते हैं चिकित्सक?
कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. प्रकाश कुमार ने बताया कि भागदौड़ भरी जीवनशैली के कारण हृदय रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इसके प्रमुख कारणों में तनाव, डायबिटीज, खराब कोलेस्ट्राल (बैड कोलेस्ट्रॉल), उच्च रक्तचाप और अन्य जीवनशैली संबंधी समस्याएं शामिल हैं।
इन जोखिम कारकों पर समय रहते नियंत्रण करना अत्यंत आवश्यक है। यही कारण है कि अब कम उम्र के लोग भी हृदय रोगों की चपेट में आ रहे हैं और हार्ट अटैक के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है।
हृदय रोग से बचाव के लिए जीवनशैली में बदलाव लाना जरूरी है, संतुलित आहार अपनाना चाहिए और अनावश्यक तनाव से बचना चाहिए।
बढ़ा हुआ कोलेस्ट्राल हृदय रोगों का एक प्रमुख कारण
डॉ. एके वर्मा ने बताया कि बढ़ा हुआ कोलेस्ट्राल हृदय रोगों का एक प्रमुख कारण है, खासकर जब शरीर में एलडीएल यानी बैड कोलेस्ट्राल का स्तर अधिक हो जाता है।
इससे धमनियों में फैट जमा होने लगता है, जो धीरे-धीरे ब्लॉकेज का रूप ले लेता है और हार्ट अटैक या स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। अनियमित खान-पान, तैलीय भोजन और शारीरिक गतिविधि की कमी इसके मुख्य कारण हैं।
समय-समय पर लिपिड प्रोफाइल की जांच, नियमित व्यायाम और आवश्यकता पड़ने पर दवाइयों के सेवन से इस जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
आवश्यक टीकाकरण से हार्ट अटैक में आती है कमी
फिजिशियन डॉ अजीत डुंगडुंग ने बताया कि 50 वर्ष की आयु के बाद नियमित रूप से आवश्यक टीकाकरण (वैक्सीनेशन) कराने से हार्ट अटैक और अन्य गंभीर हृदय संबंधी जटिलताओं के जोखिम में कमी देखी गई है।
उन्होंने कहा कि सीजनल और श्वसन संबंधी संक्रमण जैसे इन्फ्लुएंजा , न्यूमोकोकल संक्रमण , कोविड-19 और हरपीस जोस्टर शरीर में सूजन को बढ़ाते हैं, जिससे पहले से मौजूद हृदय रोग या जोखिम कारकों वाले लोगों में हार्ट अटैक की संभावना बढ़ सकती है।
ऐसे संक्रमणों से बचाव के लिए समय पर टीकाकरण कराने से न केवल गंभीर संक्रमण से सुरक्षा मिलती है, बल्कि संक्रमण के दौरान हृदय पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव को भी कम किया जा सकता है।
विशेष रूप से बुजुर्गों, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और पहले से हृदय रोग से ग्रसित मरीजों के लिए टीकाकरण एक प्रभावी और सुरक्षित निवारक उपाय माना जाता है।
उच्च रक्तचाप को कहा जाता है साइलेंट किलर
डॉ रत्नेश दूबे के अनुसार उच्च रक्तचाप को साइलेंट किलर कहा जाता है क्योंकि इसके लक्षण लंबे समय तक दिखाई नहीं देते, लेकिन यह हृदय पर गंभीर प्रभाव डालता है।
लगातार बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर दिल को सामान्य से अधिक मेहनत करने पर मजबूर करता है, जिससे हार्ट फेल्योर, हार्ट अटैक और किडनी से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं।
नमक का अधिक सेवन, तनाव और नींद की कमी इसके प्रमुख कारण हैं। नियमित जांच, संतुलित आहार व तनाव प्रबंधन से ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखा जा सकता है।
डायबिटीज रोगियों कराएं हृदय की नियमित जांच
डाबिटोलाजिस्ट डॉ प्रियंका चटर्जी ने बताया कि डायबिटीज के मरीजों में हृदय रोग का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में कई गुना अधिक होता है। बढ़ी हुई ब्लड शुगर धमनियों को नुकसान पहुंचाती है और उनमें सूजन व ब्लाकेज की प्रक्रिया को तेज कर देती है।
ऐसे मरीजों में हार्ट अटैक अक्सर बिना स्पष्ट लक्षणों के भी हो सकता है। इसलिए डायबिटीज के रोगियों के लिए शुगर नियंत्रण के साथ-साथ हृदय की नियमित जांच, स्वस्थ जीवनशैली और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार उपचार बेहद जरूरी है।
लक्षण पर ध्यान और समय पर जांच अहम
डॉ. विकास कुमार ने बताया कि हार्ट अटैक के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका समय पर पहचान और तुरंत इलाज की होती है।
सीने में दर्द, सांस फूलना, पसीना आना, बाएं हाथ या जबड़े में दर्द जैसे लक्षणों को हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि देरी होने पर हृदय की मांसपेशियों को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है।
आजकल बदलती जीवनशैली, धूम्रपान, तनाव और शारीरिक निष्क्रियता के कारण युवाओं में भी हार्ट अटैक के मामले बढ़ रहे हैं।
ऐसे में लोगों को लक्षणों के प्रति जागरूक होना, नियमित स्वास्थ्य जांच कराना और किसी भी आपात स्थिति में तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेना अत्यंत आवश्यक है। |
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