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उच्च हिमालयी क्षेत्र के जंगलों का सर्दियों में धधकना चिंता का विषय, ग्लेशियरों पर भी मंडरा रहा खतरा

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वैज्ञानिक अध्ययन से सामने आएंगे आग लगने के सही कारण. File Photo



केदार दत्त, देहरादून। शीतकाल में चमोली जिले में नंदादेवी राष्ट्रीय पार्क की फूलों की घाटी रेंज के जंगलों में सप्ताहभर से लगी आग की घटना ने उच्च हिमालयी क्षेत्र की जैव विविधता के साथ ही अन्य खतरों को लेकर सोचने पर विवश कर दिया है। विशेषज्ञ इसे जलवायु परिवर्तन के असर के तौर पर देख रहे हैं। साथ ही उनका कहना है कि शीतकाल में जंगलों के सुलगने के सही कारणों का पता लगाने को वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक है। इसमें सामने आने वाले कारणों के आधार पर उच्च हिमालयी क्षेत्र के वनों में अग्नि नियंत्रण के लिए ठोस एवं प्रभावी नीति बननी चाहिए।

उच्च हिमालयी क्षेत्र के जंगलों के परिदृश्य में देखें तो फूलों की घाटी रेंज से पहले भी राज्य में इस तरह की घटनाएं नियमित अंतराल में हो रही हैं। वर्ष 2016 से लेकर 2025 तक भी पिथौरागढ़, उत्तरकाशी, चमोली जिलों के 3500 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र के जंगलों में शीतकाल में आग धधकी थी। यद्यपि, इन पर जल्द काबू पा लिया गया था, लेकिन आग लगने के कारणों का आज तक खुलासा नहीं हुआ। इस बार फूलों की घाटी रेंज में जिस तरह से सप्ताहभर से जंगल सुलग रहे हैं, उसने उच्च हिमालयी क्षेत्र के लिए खतरे की घंटी भी बजा दी है।
यह मंडरा रहे खतरे

  • आग से उच्च हिमालयी क्षेत्र में पाई जाने वाली वनस्पतियों, जड़ी-बूटियों व दुर्लभ वन्यजीवों के अस्तित्व पर संकट।
  • शीतकाल में हवा की गति कम होने से काला धुंआ उठकर बर्फ की श्वेत चादर ओढ़े ग्लेशियरों पर जम जाता है।
  • काला कार्बन सूरज की गर्मी को सोख लेता है, जिससे तापमान बढऩे पर बर्फ पिघलने लगती है।
  • तापमान में मामूली वृद्धि भी बर्फ के स्थायित्व को समाप्त कर देती है, जिससे पकड़ ढीली होने से हिमस्खलन का खतरा बढ़ता है।

शीतकाल में सुलगते रहे हैं उच्च हिमालयी क्षेत्र के जंगल

  • वर्ष - जिला - क्षेत्र
  • 2025 - उत्तरकाशी- डुंडा, धरासू
  • 2024 - चमोली - जोशीमठ, नीती घाटी, तपोवन, पीपलकोटी
  • 2021 - चमोली - नंदादेवी राष्ट्रीय पार्क का बफर जोन
  • 2016 - पिथौरागढ़- उच्च हिमालयी क्षेत्र में सुलगे थे जंगल


\“पश्चिमी विक्षोभ पूरी तरह से गड़बड़ा गया है। इससे पूरे साल की पारिस्थितिकी साइकिल बदल गई है। वर्षा, गर्मी, सर्दी इस सबका एक तंत्र है, जो गड़बड़ा गया है। शीतकाल में वर्षा-बर्फबारी न होने से एवलांच का भी खतरा बढ़ सकता है। जहां तक जंगलों के शीतकाल में धधकने की बात है तो यह नमी की कमी को दर्शाता है। यदि वर्षा-बर्फबारी हो जाती तो आग नहीं फैलती। इस मौसम में जंगलों का जलना खतरनाक संकेत है। इससे निबटने को गहन अध्ययन जरूरी है।
- पद्मभूषण डा अनिल प्रकाश जोशी, प्रसिद्ध पर्यावरणविद्

\“उच्च हिमालयी क्षेत्र के जंगलों में आग की घटनाओं को बेहद गंभीरता से लेने की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन के असर के अलावा इसके अन्य कारण भी हो सकते हैं। इसलिए वैज्ञानिक अध्ययन बेहद जरूरी है। अध्ययन रिपोर्ट इसके बाद प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए।\“
- जयराज, सेवानिवृत्त पीसीसीएफ, उत्तराखंड वन विभाग

शीतकाल में क्यों सुलग रहे जंगल, अध्ययन कराएगी सरकार

देहरादून: उत्तराखंड में शीतकाल में जंगलों में आग लगने की घटनाओं को लेकर सरकार सतर्क हो गई है। कारणों का पता लगाने के लिए सरकार गहन अध्ययन कराएगी। वन मंत्री सुबोध उनियाल ने इस संबंध में विभाग प्रमुख को निर्देश दिए हैं। वन मंत्री उनियाल ने कहा कि शीतकाल में वनों में आग की घटनाएं चिंता का विषय है। विशेषकर उच्च हिमालयी क्षेत्रों के जंगलों में आग क्यों लग रही है, इसके कारणों की पड़ताल होनी आवश्यक है। उन्होंने बताया कि वन विभाग के मुखिया प्रमुख वन संरक्षक को निर्देश दिए गए हैं कि इन कारणों के दृष्टिगत वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाए। उन्होंने कहा कि अध्ययन रिपोर्ट के बाद स्थिति से निबटने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएंगे।

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