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बिहार में संक्रांति पर सियासी पिच गरमाई: विजय सिन्हा के दही-चूड़ा भोज में शामिल हुए नीतीश कुमार, राजनीति की उठी लहर

deltin33 1 hour(s) ago views 602
  

विजय सिन्हा के दही-चूड़ा भोज में शामिल हुए नीतीश कुमार



जागरण संवाददाता, पटना। बिहार में मकर संक्रांति के पावन अवसर पर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं और सियासी वातावरण पहले से और अधिक गरमाता नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सोमवार सुबह डिप्टी सीएम विजय सिन्हा के आवास पर आयोजित दही-चूड़ा भोज कार्यक्रम में शामिल हुए, जिससे संक्रांति की रस्में अब राजनीतिक महफिलों का हिस्सा बनती दिख रही हैं।

  

  

सूत्रों के मुताबिक, दही-चूड़ा भोज कार्यक्रम रविवार से शुरू हुए कई आयोजनों की एक कड़ी है, जिनमें पटना के वरिष्ठ नेताओं ने हिस्सा लिया।

विजय सिन्हा के सरकारी आवास पर आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अलावा डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी, बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल तथा अन्य वरिष्ठ राजनीतिक हस्तियों की मौजूदगी ने इस आयोजन को एक राजनीतिक प्लेटफॉर्म का रूप दिया।

नीतीश कुमार प्रगति यात्रा पर रवाना होने से पहले यह कार्यक्रम हुआ, जिसमें संक्रांति के शुभ अवसर पर नेताओं ने पारंपरिक भोज का आनंद लिया।

भोज के दौरान नेताओं के बीच पारंपरिक दही-चूड़ा का आदान-प्रदान हुआ, जिसे बिहार में सामाजिक मेल-जोल और शुभकामनाओं का प्रतीक माना जाता है।

हालांकि इस कार्यक्रम को धार्मिक परंपरा के साथ जोड़कर देखा जा रहा है, राजनीतिक विश्लेषक इसे आगामी चुनाव और गठबंधन समीकरणों की तैयारी का हिस्सा भी मान रहे हैं।

बताया गया है कि पटना में आने वाले दिनों में कई अन्य दही-चूड़ा भोज और राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिसमें केंद्रीय नेताओं से लेकर प्रदेश के वरिष्ठ और युवा प्रतिनिधि भी शामिल होंगे।

इस प्रकार के आयोजन पारंपरिक उत्सव के साथ-साथ नेताओं के संवाद और सियासी समीकरणों के फेर बदल का भी माध्यम बनते हैं।

वहीं, राजनीतिक स्तर पर बातचीत यह भी संकेत दे रही है कि संक्रांति जैसे सामाजिक अवसरों पर नेताओं की मौजूदगी से मतदाता संपर्क भी बढ़ेगा।

भोज कार्यक्रम के दौरान नेताओं के बीच हुई बातचीत, सार्वजनिक समर्थन और स्थानीय नेताओं की भागीदारी से सियासी गलियारों में चर्चाओं का सिलसिला जारी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार में पारंपरिक त्योहारों को सियासत से जोड़कर देखा जाना अब आम बात हो गई है, और इस तरह के कार्यक्रम आगामी चुनाव के लिए माहौल बनाने में मदद करते हैं।

राजनीतिक कार्यक्रमों, सांस्कृतिक आयोजनों और पारंपरिक भोज के जरिए जनता के दृष्टिकोण को समझने और मतदाताओं के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिशें तेजी से बढ़ रही हैं।

यह भी देखा जा रहा है कि भोज जैसे कार्यक्रमों में शामिल नेताओं की उपस्थिति, गठबंधन की मजबूती और स्थानीय समीकरणों पर भी प्रभavi डालेगी, जिससे बिहार की राजनीतिक दिशा अगले कुछ हफ्तों में और स्पष्ट रूप से सामने आएगी।
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