सरस्वती पूजा को लेकर तैयारियां। फोटो जागरण
अवध किशोर शर्मा, हाजीपुर। सोनपुर मेला क्षेत्र का गाय बाजार इन दिनों कलात्मक आभा से सराबोर है। राजस्थान के जोधपुर से आए मूर्तिकारों की टोली यहां कला और विद्या की देवी मां सरस्वती की आकर्षक मूर्तियों को अंतिम रूप देने में जुटी है। आगामी 23 जनवरी को होने वाली सरस्वती पूजा को लेकर तैयारियां चरम पर हैं।
जैसे-जैसे मूर्तियों में रंग भरा जा रहा है, उनकी सजीवता राहगीरों को ठहरने पर मजबूर कर रही है। पूजा नजदीक आते-आते अधिकांश मूर्तियों की बिक्री हो जाती है। इस बार भी कई मूर्तियां पहले से ही बुक हो चुकी हैं। मूर्तिकारों का कहना है कि लाखों रुपये का यह कारोबार उनके परिवार की रोजी-रोटी से जुड़ा हुआ है, जिसके लिए उन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में प्रवास करना पड़ता है।
सोनपुर मेला भी उन्हीं प्रमुख स्थलों में से एक है। मूर्तिकार मूर्तियों को मजबूती देने के लिए मिट्टी में नारियल के रेशे का घोल मिलाते हैं, जिससे प्रतिमा हल्की और टिकाऊ बनती है। देवी सरस्वती की मूर्तियों के श्रृंगार में पुरुषों के साथ-साथ महिला मूर्तिकार भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। रंग-रोगन के बाद प्रतिमाएं जीवंत नजर आने लगती हैं, जो श्रद्धालुओं को खूब आकर्षित कर रही हैं।
राजस्थान के जोधपुर निवासी युवा मूर्तिकार व विक्रेता नारायण लाल ने बताया कि सोनपुर के इस क्षेत्र में राजस्थान के मूर्तिकार पिछले 15 से 20 वर्षों से आते रहे हैं। त्योहारों के मौसम में वे सोनपुर सहित देश के विभिन्न हिस्सों में मूर्तियों का निर्माण और बिक्री करते हैं।
उन्होंने बताया कि इस बार देवी सरस्वती की मूर्तियों की मांग को देखते हुए बड़ी संख्या में प्रतिमाएं बनाई गई हैं। ये मूर्तियां 150 रुपये से लेकर 8,000 रुपये तक की कीमत में उपलब्ध हैं। कम कीमत और आकर्षक स्वरूप के कारण इनकी मांग लगातार बढ़ रही है। मूर्तियों के सजावटी कार्य में महिला मूर्तिकारों की भागीदारी भी उल्लेखनीय है।
पर्यावरण के लिए अनुकूल नहीं है पीओपी की मूर्तियां
हालांकि पर्यावरणविदों का मानना है कि प्लास्टर आफ पेरिस से बनी मूर्तियां सस्ती, हल्की और आकर्षक जरूर होती हैं, लेकिन पर्यावरण की दृष्टि से इनके निर्माण और विसर्जन पर आपत्ति जताई जाती रही है।
सार्वजनिक नदियों और तालाबों में पीओपी की मूर्तियों के विसर्जन पर प्रतिबंध है। मिट्टी की मूर्तियां पानी में जल्दी घुल जाती हैं, जबकि प्लास्टर आफ पेरिस से बनी मूर्तियों को घुलने में अधिक समय लगता है और इनमें मौजूद रसायन जल प्रदूषण को बढ़ावा देते हैं।
अदालतें भी इसे पर्यावरण के लिए प्रतिकूल मान चुकी हैं। इसके बावजूद देवी सरस्वती की पीओपी से बनी मूर्तियों की बिक्री में कोई कमी नहीं आई है। सस्ती, हल्की और अत्यंत सुंदर होने के कारण लोग इन्हें पूजा के साथ-साथ घरों में सजावट के लिए भी खरीद रहे हैं। यही वजह है कि सोनपुर मेला में जोधपुर के मूर्तिकारों की ये मूर्तियां आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। |
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