22 दिन से धूप नसीब नहीं
जागरण संवाददाता, पटना। राजधानी पटना और आसपास के इलाकों में बीते 22 दिनों से या तो भगवान भास्कर के दर्शन नहीं हुए या उनकी गर्माहट का अहसास नहीं हो पाया। लगातार कोहरा, ठंड और बादलों की वजह से लोगों को पर्याप्त धूप नहीं मिल सकी है। इसका सीधा असर पहले से ही विटामिन डी की कमी से जूझ रही आबादी पर पड़ रहा है। डॉक्टर इसे एक “साइलेंट हेल्थ इमरजेंसी” मान रहे हैं, क्योंकि इसकी शुरुआत में लक्षण स्पष्ट नहीं होते, लेकिन धीरे-धीरे यह शरीर को अंदर से कमजोर कर देती है।
सरकारी आंकड़े भी इस खतरे की गंभीरता को उजागर करते हैं। वर्ष 2023 में सरकारी अस्पतालों में कराए गए एक सर्वे में जिले के 82 प्रतिशत लोगों में विटामिन डी की कमी पाई गई थी, जिसमें शहरी आबादी का अनुपात अधिक था।
वहीं, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) के अनुसार देश की करीब 73 प्रतिशत आबादी विटामिन डी की कमी से पीड़ित है। पटना की स्थिति देश के सबसे अधिक प्रभावित शहरों में शामिल है, जहां कमी का स्तर बड़ोदरा, सूरत और अहमदाबाद जैसे शहरों के बराबर या उनसे अधिक पाया गया है।
पीएमसीएच के न्यूरो मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. गुंजन कुमार, आईजीआईएमएस के मेडिसिन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मनोज कुमार चौधरी और एनएमसीएच के हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. बीएन चतुर्वेदी के अनुसार विटामिन डी की कमी इसलिए ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण अक्सर नजरअंदाज हो जाते हैं।
बार-बार फ्रैक्चर होना, जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द, लगातार थकान, बाल झड़ना, बार-बार बीमार पड़ना या बच्चों में रिकेट्स और दांतों की सड़न जैसी समस्याएं सामने आने पर ही जांच कराई जाती है। समस्या यह भी है कि इसकी जांच महंगी होने के कारण सामान्य स्वास्थ्य परीक्षण में इसे शामिल नहीं किया जाता।
एनएमसीएच के हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. बीएन चतुर्वेदी बताते हैं कि राजधानी की बदलती जीवनशैली भी इस संकट को बढ़ा रही है। ऊंचे अपार्टमेंट, छोटे फ्लैट, खुले मैदानों की कमी और घर के भीतर सीमित गतिविधियां सूर्य की किरणों को लोगों तक पहुंचने नहीं दे रही हैं।
घर में रहने वाली महिलाएं और स्कूल जाने वाले बच्चे धूप से सबसे ज्यादा वंचित हैं। इसका बच्चों की हड्डियों की मजबूती और मानसिक विकास पर सीधा असर पड़ रहा है।
महिलाओं में जोड़ों का दर्द, मांसपेशियों की कमजोरी और हार्मोनल असंतुलन की शिकायतें बढ़ी हैं। वहीं, बुजुर्गों में ऑस्टियोपोरोसिस यानी हड्डियों के खोखलेपन की समस्या के कारण मामूली झटके से फ्रैक्चर के मामले बढ़ रहे हैं।
आईजीआईएमएस के मेडिसिन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मनोज कुमार चौधरी के अनुसार लगातार ठंड और कोहरे के कारण लोग पर्याप्त धूप नहीं ले पा रहे हैं।
नतीजतन, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पहले से कमजोर थी, वह और घट गई है। इससे सर्दी-खांसी, फ्लू, वायरल संक्रमण और सांस से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।
बच्चे इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। विटामिन डी की कमी धीरे-धीरे शरीर को बीमारियों के प्रति संवेदनशील बना देती है।
पीएमसीएच के न्यूरो मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. गुंजन कुमार का कहना है कि हड्डियों और मांसपेशियों में दर्द, कमजोरी और लगातार थकान के कारण लोगों में चिड़चिड़ापन, बेचैनी और डिप्रेशन जैसी मानसिक समस्याएं भी बढ़ रही हैं।
नींद न आना और काम में मन न लगना भी इसके सामान्य लक्षण हैं।
विटामिन डी की कमी के प्रमुख लक्षण और प्रभाव
- हड्डियां और मांसपेशियां कमजोर होना: कमर, घुटनों और जोड़ों में दर्द, बच्चों में रिकेट्स, बुजुर्गों में ऑस्टियोपोरोसिस।
- इम्युनिटी कमजोर होना: बार-बार सर्दी-खांसी, वायरल संक्रमण, बीमारी से उबरने में देरी।
- मानसिक स्वास्थ्य पर असर: चिड़चिड़ापन, उदासी, डिप्रेशन, नींद की समस्या।
- थकान और ऊर्जा की कमी: दिनभर सुस्ती, काम करने की क्षमता में गिरावट।
- महिलाओं में विशेष समस्याएं: हार्मोनल असंतुलन, हड्डियों की कमजोरी।
- बच्चों में विकास प्रभावित: लंबाई-वजन का रुकना, दांत और हड्डियां कमजोर होना।
- दिल और शुगर का खतरा: हाई ब्लड प्रेशर, टाइप-2 डायबिटीज और हृदय रोग का जोखिम।
- त्वचा और बाल: बाल झड़ना, त्वचा का रूखापन, घाव भरने में देरी।
कैसे बढ़ाएं शरीर में विटामिन डी
- डॉक्टरों के अनुसार थोड़ी सी सावधानी और नियमित आदतों से विटामिन डी की कमी को काफी हद तक दूर किया जा सकता है।
- रोजाना सुबह 10 से दोपहर 2 बजे के बीच 15–20 मिनट धूप में रहें। हाथ, पैर और चेहरे पर सीधी धूप पड़ना जरूरी है।
- आहार में दूध, दही, पनीर, अंडा, मछली और फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थ शामिल करें।
- डॉक्टर की सलाह से विटामिन डी सप्लीमेंट या कैल्शियम के साथ विटामिन डी लें।
- बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
- साल में एक या दो बार विटामिन डी की जांच जरूर कराएं, खासकर अगर बार-बार थकान, दर्द या फ्रैक्चर की समस्या हो।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते इस “साइलेंट खतरे” पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में हड्डियों, मानसिक स्वास्थ्य और इम्युनिटी से जुड़ी बीमारियां और बढ़ सकती हैं। धूप, संतुलित आहार और सही चिकित्सकीय सलाह ही इससे बचाव का सबसे प्रभावी रास्ता है। |