जितेंद्र उपाध्याय, लखनऊ। गन्ने के उत्पादन में सामान्य फसलों के मुकाबले सबसे अधिक पानी की खपत होती है। गन्ने के उत्पादन में पानी की लागत को कम करने के लिए विज्ञानी शोध करने में लगे हैं। रायबरेली रोड स्थित भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान के विज्ञानियों ने पिछले पांच वर्षों में एक दर्जन नई गन्ने की प्रजातियों को बना कर किसानोें को फायदा देने का कार्य कर किया।
वैज्ञानिकों का दावा है कि नई प्रजातियों से 15 से 20 प्रतिशत पानी की खपत कम होगी और 10 से 15 प्रतिशत गन्ने का उत्पादन बढ़ेगा। आने वाले समय में आने वाली प्रजातियों में पानी खपत में 25 से 30 प्रतिशत तक की कमी होगी।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 15 जिलों में 23.34 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ने की खेती होती है जबकि पूरे प्रदेश में 28.53 लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन पर गन्ने की खेती होती है, जिस पर 839 क्विंटल प्रति हेक्टेयर गन्ने का उत्पादन होता है।
उत्तर भारत की बात करें तो यहां पर प्रति हेक्टेयर गन्ने की खेती के लिए 1400 मिली लीटर पानी की जरूरत होती है। पिछले पांच वर्षों में गन्ने की नई प्रजातियों से चीनी की मात्रा में बढ़ोतरी के साथ ही गन्ने के उत्पादन में भी 10 से 20 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है।
इन प्रजातियों से बचेगा पानी
- -कोलख-15201
- -कोलख-15204
- -कोलख- 15466
- -सीओएलके- 14204
- -सीओ- 15023
- -सीओपीबी- 14185
- -सीओएसई- 11453
- -एमएस - 130081
- -वीएसआइ- 12121
- -सीओ - 13013
- -अवनी- 14012
- -कोपी- 11438
गन्ने के उत्पादन को बढ़ाने और नई प्रजातियों के निर्माण के लिए 16 फरवरी 1952 में संस्थान की स्थापना हुई। गन्ने के विकास को लेकर संस्थान की ओर से समय-समय पर शोध किए जाते हैं। कई वर्षों की मेहनत के बाद नई प्रजातियां विकसित होती हैं। कम लागत में अधिक उत्पादन बढ़ाने के साथ ही रोग नियंत्रण को लेकर शोध कार्य किए जा रहे हैं। आने वाले समय 30 से 40 प्रतिशत पानी की खपत करने वाली प्रजातियों को लेकर विज्ञानी शोध कर रहे हैं। स्थापना दिवस पर नई प्रजाति जारी होने की संभावना है। -डा.दिनेश सिंह, निदेशक, भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान |
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