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अंग्रेज जमाने का धालभूमगढ़ एयरपोर्ट।
जासं, जमशेदपुर । कोल्हान क्षेत्र में हवाई सेवा के सपने को लेकर एक बार फिर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। धालभूमगढ़ में प्रस्तावित ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट की राह में अब केवल जंगल और हाथी ही नहीं, बल्कि आसमान की दूरी भी बड़ी बाधा बनकर सामने आ रही है। केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू के हालिया बयान ने इस मुद्दे को फिर से केंद्र में ला दिया है। केंद्रीय मंत्री ने स्पष्ट किया है कि मौजूदा नीति के अनुसार किसी भी नागरिक हवाई अड्डे के 150 किलोमीटर की हवाई दूरी (एरियल डिस्टेंस) के भीतर नए ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट को सामान्यतः अनुमति नहीं दी जाती। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि यदि ऐसा कोई प्रस्ताव आता है, तो मौजूदा एयरपोर्ट पर उसके संभावित प्रभाव का आकलन कर केस-टू-केस आधार पर राहत दी जा सकती है। मंत्री के इस बयान ने धालभूमगढ़ एयरपोर्ट को लेकर नई उम्मीद तो जगाई है, लेकिन साथ ही तकनीकी अड़चनों को भी उजागर कर दिया है।
रांची से दूरी बना सबसे बड़ा सवाल ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट पॉलिसी-2008 के अनुसार, दो हवाई अड्डों के बीच न्यूनतम 150 किलोमीटर की हवाई दूरी होनी अनिवार्य है। तकनीकी आंकड़ों के अनुसार, रांची स्थित बिरसा मुंडा एयरपोर्ट से धालभूमगढ़ प्रस्तावित एयरपोर्ट की एरियल डिस्टेंस लगभग 130 से 135 किलोमीटर के बीच है। यह दूरी तय मानक से कम है, जो परियोजना के लिए गंभीर बाधा मानी जा रही है। इसके विपरीत, रांची से देवघर एयरपोर्ट की हवाई दूरी 150 किलोमीटर से अधिक है, इसलिए वहां इस नियम की बाधा नहीं आई। लेकिन जमशेदपुर और धालभूमगढ़ के मामले में यही दूरी अब सबसे बड़ा तकनीकी पेंच बन गई है। जानकारों का मानना है कि यदि केंद्र सरकार यह मान ले कि धालभूमगढ़ एयरपोर्ट से रांची एयरपोर्ट के यात्री और व्यावसायिक हितों पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा, तभी इसे विशेष छूट मिल सकती है।
हाथी और जंगल से शुरू हुआ संघर्ष धालभूमगढ़ एयरपोर्ट का सफर शुरुआत से ही संघर्षों से भरा रहा है। वर्ष 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने इसका शिलान्यास किया था। भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण और झारखंड सरकार के बीच एमओयू भी हुआ था तथा करीब 100 करोड़ रुपये के निवेश की योजना बनी थी। लेकिन शिलान्यास के कुछ ही समय बाद वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने परियोजना पर आपत्ति जता दी। प्रस्तावित क्षेत्र एलीफेंट कॉरिडोर में आता है, जहां हाथियों का प्राकृतिक आवागमन होता है। वन विभाग ने स्पष्ट किया कि एयरपोर्ट निर्माण से वन्यजीवों और खासकर हाथियों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। इसी कारण परियोजना पिछले छह वर्षों से फाइलों में अटकी हुई है।
कोल्हान का अधूरा सपना देश के प्रमुख औद्योगिक शहरों में गिने जाने वाले जमशेदपुर के पास आज भी पूर्ण विकसित हवाई अड्डा नहीं है। सोनारी एयरपोर्ट से सीमित उड़ानें जरूर संचालित होती हैं, लेकिन बड़े विमानों की सुविधा नहीं है। धालभूमगढ़ एयरपोर्ट से इस कमी को दूर करने की उम्मीद जगी थी, लेकिन पहले पर्यावरणीय अड़चन और अब 150 किलोमीटर का नियम इस सपने को बार-बार रोक रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राज्य सरकार, स्थानीय जनप्रतिनिधि और सांसद केंद्र के समक्ष मजबूत पैरवी करें, तभी धालभूमगढ़ को विशेष मामले के रूप में राहत मिल सकती है। फिलहाल, कोल्हानवासियों की उड़ान अभी भी तकनीकी नियमों और नीतिगत बादलों के बीच फंसी हुई नजर आ रही है। |
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