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जागरण संवाददाता, जमशेदपुर। झारखंड में लौहनगरी की शामें इन दिनों गुलाबी ठंड में भी तपिश लिए हुए हैं। वजह है शहर के हर नुक्कड़ पर खौलती चाय की केतली और उससे उठती बहसों की भाप। लौहनगरी की सड़कों पर सर्द हवाओं के बीच चाय के कुल्हड़ की सोंधी महक लोगों को न सिर्फ गर्माहट दे रही है, बल्कि उनके दिनभर के तनाव, तकलीफ और तर्कों का भी मंच बन चुकी है। साकची से लेकर सोनारी, मानगो से बिष्टुपुर तक हर नुक्कड़ अब एक छोटी-सी संसद में तब्दील हो चुका है, जहां हर प्याली के साथ उठते मुद्दे कभी हंसी बन जाते हैं और कभी ठोस राय में ढल जाते हैं।
कोहरे के बीच सजती है आम आदमी की संसद सुबह की धुंध जैसे ही सूरज की किरणों से रास्ता बनाती है, शहर के प्रमुख चौक-चौराहों पर महफिलें जमने लगती हैं। मानगो चौक, साकची गोलचक्कर और जुबिली पार्क के बाहर लोग एकत्रित होते हैं और देखते ही देखते चाय की दुकानें चर्चा के केंद्र में बदल जाती हैं। यहां अदरक वाली चाय की चुस्कियों के साथ अंतरराष्ट्रीय राजनीति, क्रिकेट, महंगाई और लोकल सरकार तक पर खुलकर बहस होती है। मानगो के एक चाय अड्डे पर बैठे सुरेश मिश्रा हंसते हुए कहते हैं, घर में भले मेरी दाल न गलती हो, पर यहां बैठकर मैं प्रधानमंत्री से लेकर अमेरिका की नीति तक पर फैसला सुना देता हूं। उनकी मुस्कान के साथ उनकी बात पर पूरा अड्डा हंस पड़ता है। मिश्रा का कहना है कि “चाय ठंडी हो सकती है, लेकिन हमारी बहस की आंच नहीं। यह वही जगह है जहां कुल्हड़ खाली होने तक हर मसले का समाधान निकाल लिया जाता है। चाहे वो राजनीति का हो या जिंदगी का।
ऑफिस का तनाव और टपरी की थेरेपी दोपहर ढलते ही इन टपरियों का मिजाज और बदल जाता है। अब बारी होती है कॉर्पोरेट दुनिया की भड़ास निकालने की। टेल्को, सिदगोड़ा और बिष्टुपुर के औद्योगिक क्षेत्रों से लंच ब्रेक में निकले युवा चाय की दुकान को किसी थेरेपी सेंटर की तरह इस्तेमाल करते हैं। बिष्टुपुर में टाटा स्टील में काम करने वाले अमित राज बताते हैं कि बॉस को तो कुछ कह नहीं सकते, इसलिए सारी भड़ास अदरक वाली चाय पर निकाल देते हैं। वो मजाक में कहते हैं कि यहां हम सब एक ही संघ के सदस्य हैं। हंसी के बीच उनकी बात सबकी थकान चुरा लेती है। एक कड़क चाय पीते ही वे फिर अगले दिन की डेडलाइन और रिपोर्ट्स के लिए तैयार महसूस करते हैं।
युवाओं का देसी हीटर और सेल्फी वाला प्यार शहर के जुबिली पार्क गेट और सोनारी एयरपोर्ट के पास स्थित टपरियां युवाओं का हॉटस्पॉट बन चुकी हैं। यहां चाय सिर्फ पेय नहीं, बल्कि एक वाइब है। सोनारी की कॉलेज छात्रा रिया बताती हैं कि जब बजट कम हो, तो स्टारबक्स जाना सपना होता है, लेकिन कुल्हड़ वाली चाय के साथ जो फोटो आती है, उसे देखकर हर कोई कॉमेंट करता है- ‘देसी लेकिन दिल से classy’। ठंड में यही कुल्हड़ हमारा हीटर है। ऐसे अड्डों पर राजनीति की जगह अब सेल्फी सेशन, रिलेशनशिप एडवाइस और फ्यूचर प्लानिंग की बातें होती हैं। यह शहर के युवाओं के लिए अपनापन और साझी भावनाओं का ठिकाना बन चुका है।
सर्दी का बहाना, अपनत्व का ठिकाना जमशेदपुर के इन नुक्कड़ों की खूबसूरती इस बात में है कि यहां कोई अमीर-गरीब नहीं, सब समान हैं। कोई सरकारी कर्मचारी, कोई ड्राइवर, कोई छात्र। सभी चाय के प्याले में एक जैसी गर्माहट ढूंढते हैं। यहां किसी को जज नहीं किया जाता, सिर्फ सुना और समझा जाता है। सिदगोड़ा की गलियों से लेकर सोनारी के किनारों तक, ये टपरियां सिर्फ स्वाद की जगह नहीं रहीं। यह वो चौपालें हैं जहां दिल खुले रहते हैं, दिलचस्प बहसें होती हैं, और रिश्तों में मिठास घुलती है। जमशेदपुर का चाय प्रेम अब महज आदत नहीं, बल्कि एक संस्कृति बन गया है। एक ऐसी संस्कृति, जो बताती है कि सर्दी भले ही मौसम का मामला हो, लेकिन गर्माहट लोगों के दिलों और बातचीतों में बसती है। उसका सबसे प्यारा जरिया है, एक कुल्हड़ कड़क चाय। |