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Makar Sankranti Shubh Muhurat: इस दिन गुजरात में पतंगबाजी का विशेष महत्व है। फाइल फोटो
डिजिटल डेस्क, मुजफ्फरपुर। Makar Sankranti 2026 Date: मकर संक्रांति भारत के उन चुनिंदा त्योहारों में शामिल है जिसे लोग स्थानीय महत्व और नाम के अनुरूप मनाते हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां यह खिचड़ी के नाम से जानी जाती है। पंजाब का लोहड़ी तो विश्व प्रसिद्ध है। दक्षिण भारत में यह पोंगल के नाम से मनाई जाती है।
स्वरूप की वजह से अनूठा
गुजरात में इसे उत्तरायण कहते हैं। खानपान, खेलकूद और आध्यात्म तीनों का इसमें विशेष महत्व होने की वजह से मकर संक्रांति एक अनूठा पर्व बन जाता है। बिहार में जहां इसकी पहचान दही-चूड़ा, तिलकुट और लाई से है तो गुजरात में पतंगबाजी से। लोहड़ी और पोंगल की विशेष परंपरा रही है।
मकर संक्रांति की तिथि और संशय
मकर संक्रांति की तिथि को लेकर हर वर्ष संशय की स्थिति रहती है। 14 जनवरी को या 15 जनवरी को। इस बार भी यह स्थिति है। इस बारे में पं.कमलापति त्रिपाठी का कहना है कि ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य 14 जनवरी 2026 की रात 9.38 बजे मकर राशि में प्रवेश कर रहे हैं।
बहुत से लोग उदयातिथि को महत्व देते हैं। इसके अनुसार जो आयोजन करेंगे वे 15 जनवरी 2026 को आयोजन करेंगे। जबकि कुछ इस बात को मानते हैं कि सूर्य का 14 जनवरी को ही मकर राशि में प्रवेश हो रहा है, इसलिए संक्रांति तो 14 जनवरी 2026 को ही मनाई जाएगी।
जहां तक बिहार और आसपास के इलाके का प्रश्न है तो इस बार 14 जनवरी 2026 को ही मकर संक्रांति मनाई जा रही है। उसके अनुसार ही स्नान और दान किया जाना है। पुण्यकाल में इसका विशेष महत्व बताया गया है।
मकर संक्रांति का शुभ मुहूर्त
- तिथि : 14 जनवरी 2026
- पुण्यकाल : दोपहर 3.13 से शाम 5.45 बजे तक
- महा पुण्यकाल : दोपहर 3.13 से शाम 4.58 बजे तक
- स्नान का शुभ समय: सुबह 9.03 से 10.48 तक
इसका विशेष महत्व
मकर संक्रांति का विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन ही प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य का प्रवेश मकर राशि में होता है। यह पिता-पुत्र के संबंधों में सुधार का प्रतीक है। माना जाता है कि इसके प्रभाव से कटुता खत्म हो जाती और मधुरता आती है।
इस दिन से सूर्य दक्षिणायण से उत्तरायण होना आरंभ होते हैं। तात्पर्य यह कि यह मौसम में बदलाव का संकेत भी होता है। कंपाने वाली ठंड के अंत की शुरुआत मकर संक्रांति वाले दिन से ही होती है। उसके बाद धीरे-धीरे मौसम में भी इसका प्रभाव झलकने लगता है। वसंत का आगमन हो जाता है।
खरमास खत्म होने के बाद शुभ कार्य की शुरुआत होती है। हालांकि इस बार स्थिति थोड़ी अलग है। शुक्र के अस्त होने की वजह से शुभ कार्य यानी शादी-विवाह व अन्य मांगलिक कार्य के शुरू होने के लिए थोड़ा इंतजार करना होगा।
पूजा विधि
- स्नान: मकर संक्रांति में स्नान महत्वपूर्ण है। संभव हो तो गंगा में या फिर किसी भी पवित्र जलाशय में शुभ समय में जरूर करें।
- अर्घ्य: स्नान के बाद भगवान सूर्य को जल अर्पित करें। इसके लिए तांबे के लोटे में जल, लाल फूल, अक्षत, काले तिल को डालने के बाद \“ॐ सूर्याय नम:\“ मंत्र का उच्चारण करें।
- पूजन: इस दिन भगवान विष्णु और सूर्य देव की पूजा करें। उन्हें तिल और गुड़ का भोग अवश्य लगाएं।
- भोजन: बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस दिन दही-चूड़ा,तिलकुट और खिचड़ी खाने की परंपरा है।
दान जरूर करें
जिस तरह से मकर संक्रांति में स्नान का विशेष महत्व है। उसी तरह से दान का भी खास स्थान है। ग्रंथों में इसकी महिमा का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। कहा गया है कि मकर संक्रांति के दिन जो दान किया जाता है उसका फल अक्षय यानी कभी नष्ट नहीं होने वाला होता है। ये दान करें -
- तिल और गुड़: शनि और सूर्य की कृपा के लिए।
- खिचड़ी: चावल, उड़द दाल, नमक और हल्दी का दान।
- गर्म कपड़े: जरूरतमंदों को कंबल या ऊनी कपड़े देना बहुत शुभ होता है।
- अनाज: नया चावल या गेहूं दान करना समृद्धि लाता है।
मकर संक्रांति के फायदे
इस अवसर पर किए जाने वाले स्नान और दान का विशेष धार्मिक महत्व है। कहा जाता है कि इस दिन किए गए दान के फल से पाप का नाश हो जाता है। सूर्य की स्थिति में बदलाव का प्रभाव भी लोगों पर सकारात्मक रूप से देखने को मिलता है। सभी प्रकार के संबंध में मधुरता आती है। व्यापार में लाभ होता है। इतना ही नहीं, इस दिन तिल और गुड़ खाने की परंपरा है। यह शरीर को ठंड से लड़ने की क्षमता देता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। |
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