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रील्स की दुनिया में खो रहा बचपन: बढ़ते वर्चुअल ऑटिज्म के मामलों ने बढ़ाई चिंता; पढ़ें डॉक्टरों की बड़ी चेतावनी

LHC0088 4 day(s) ago views 308
  

प्रतीकात्‍मक च‍ित्र



जागरण संवाददाता, मुरादाबाद। मोबाइल और डिजिटल डिवाइस का बढ़ता उपयोग अब बच्चों की मानसिक सेहत के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। कम उम्र में स्मार्टफोन की लत, घंटों तक स्क्रीन के सामने समय बिताना और शारीरिक गतिविधियों की कमी बच्चों की मानसिक वृद्धि, व्यवहार और सीखने की क्षमता पर नकारात्मक असर डाल रही है।

विशेषज्ञ इसे आने वाले समय के लिए चेतावनी मान रहे हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार लगातार मोबाइल देखने से बच्चों की एकाग्रता कमजोर हो रही है। रील्स और शार्ट वीडियो की आदत के कारण बच्चे 15-20 सेकेंड से अधिक किसी चीज पर ध्यान नहीं लगा पा रहे हैं, जिससे किताबें और पढ़ाई उन्हें उबाऊ लगने लगी हैं।

शहर के अस्पतालों की ओपीडी में हर माह 30 से अधिक ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां बच्चे छोटी उम्र में ही मोबाइल पर निर्भर हो गए हैं और बिना मोबाइल के खाना तक नहीं खा रहे। विशेषज्ञ इसे वर्चुअल आटिज्म का बढ़ता खतरा बता रहे हैं, जिसमें बच्चों का सामाजिक और भावनात्मक विकास प्रभावित होता है।
बच्चों में दिख रहे प्रमुख लक्षण

  • लोगों से बातचीत में रुचि न लेना
  • बोलने या जवाब देने में देरी
  • आंखों से संपर्क न बनाना
  • नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया न देना

ऐसे करें बचाव :

  • तीन साल से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखें।
  • 5 से 7 साल के बच्चों को जरूरत पड़ने पर सीमित समय के लिए टीवी दिखाएं।
  • 10 साल तक के बच्चों को अभिभावकों की निगरानी में ही स्क्रीन देखने दें।
  • 10 से 15 साल के बच्चों को स्क्रीन टाइम से होने वाले नुकसान समझाएं और खेलकूद के लिए प्रेरित करें।


  


हमारे पास महीने में लगभग 30 मामले वर्चुअल आटिज्म के पहुंच रहे हैं। इसमें अधिकतर ऐसे बच्चों के हैं जो स्क्रीन में आने वाली रील्स या कार्टून का मतलब भी नहीं समझते हैं। नवजात और पांच साल से छोटे बच्चों को फोन से दूर रखने के पूरे प्रयास करें, पांच से 8 साल तक के बच्चों को आवश्यक होने पर अभिभावक अपनी निगरानी में ही टीवी या टैब स्क्रीन दिखाएं। बच्चों को मोबाइल से दूर रखें। 10 साल से ऊपर के बच्चों को आवश्यक होने पर टैब उपलब्ध कराएं फोन आदि की लत से बचाने के लिए अभिभावक स्वयं भी स्क्रीन से दूरी बनाएं।

- डा. अभिनव शेखर, मानसिक रोग विशेषज्ञ जिला अस्पताल मुरादाबाद।





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