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दिल्ली में रील्स छोड़ प्रकृति से जुड़ रहे बच्चे, पैरेंट्स की भी पहली पसंद बनी फोटोग्राफी वॉक

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सुंदर नर्सरी में आयोजित फोटो वाक में भाग लेते बच्चे।



शालिनी देवरानी, दक्षिणी दिल्ली। “वाओ… देखो मैंने तितली की फोटो क्लिक की है, कितनी सुंदर लग रही है!” “ये फूल कितने प्यारे हैं, इनकी भी तस्वीर ले लूं?” “पेड़ पर बैठी चिड़िया साफ कैसे दिखेगी, फोटो कैसे क्लिक करूं…?” ऐसे ढेरों मासूम सवाल, आंखों में चमक और चेहरे पर उत्साह- कुछ ऐसा ही नजारा बच्चों के लिए आयोजित खास फोटो वॉक में देखने को मिलता है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

यह कोई पारंपरिक कक्षा नहीं, जहां ब्लैकबोर्ड और बेंच हों, बल्कि खुला पार्क ही पाठशाला बन जाता है। बच्चों के हाथों में मोबाइल या कैमरा होता है, लेकिन रील्स देखने के लिए नहीं, प्रकृति के छोटे-छोटे पलों को सहेजने के लिए। सवाल सिर्फ तस्वीर लेने के नहीं होते, बल्कि देखने, समझने और महसूस करने के होते हैं।

मोबाइल स्क्रीन पर थमी उंगलियों और तेजी से बदलती रील्स की दुनिया से निकलकर अब दिल्ली-एनसीआर के बच्चे खुली हवा में सांस ले रहे हैं और कैमरे की नजर से असली दुनिया को पहचानना सीख रहे हैं। वीकेंड पर गैजेट्स से दूरी और प्रकृति से नजदीकी बढ़ाने के लिए बच्चों के लिए आयोजित ये फोटो वॉक अभिभावकों की भी पहली पसंद बनती जा रही हैं- जहां खुशी, सीख, और रचनात्मकता एक साथ कदमताल करते हैं।

सुंदर नर्सरी, लोधी गार्डन और डियर पार्क जैसे हरियाली से भरपूर स्थान अब इन ओपन-एयर फोटोग्राफी पाठशालाओं के पसंदीदा ठिकाने बन चुके हैं। यहां बच्चे सिर्फ तस्वीरें नहीं खींचते, बल्कि रोशनी, रंग, छाया और फ्रेम के साथ-साथ प्रकृति की धड़कन को महसूस करना भी सीखते हैं।

पत्तियों की नाजुक बनावट, फूलों के गहरे-हल्के रंग, धूप-छांव की लकीरें, हवा में उड़ते पक्षी और आसमान के बदलते रंगों को कैमरे में कैद करते हैं और इस पूरी प्रक्रिया में सिर्फ तस्वीरें नहीं लेते, प्रकृति से संवाद करना सीखते हैं।

पत्तियों पर ठहरी ओस की चमक हो या आसमान में पंख फैलाकर उड़ते पक्षी, बदलता मौसम हो या खुला नीला आसमान- सब कुछ मानो बच्चों के कैमरे और मन, दोनों में एक साथ उतर जाता है। प्रकृति का हर दृश्य, हर पल उनके जेहन में एक नए पाठ की तरह दर्ज हो जाता है।
स्क्रीन से दूरी, प्रकृति से जुड़ाव

इन फोटो वॉक का मकसद बच्चों के हाथ में कैमरा थमाना भर नहीं, बल्कि उन्हें प्रकृति से सीखने का मौका देना है। यहां प्रशिक्षक बच्चों को धैर्य, अवलोकन और संवेदनशीलता का महत्व समझाते हैं और बताते हैं कि कैसे एक अच्छी तस्वीर लेने से पहले ठहरना, देखना और महसूस करना जरूरी है।

यही सीख उन्हें स्क्रीन की दुनिया से बाहर निकालकर प्रकृति की सहज लय से जोड़ती है। अभिभावकों के लिए भी यह पहल सुकून से भरी है, क्योंकि यहां बच्चे मनोरंजन के साथ सीखते हैं, रचनात्मक बनते हैं और आत्मविश्वास के साथ प्रकृति का पाठ पढ़ते हैं। अभिभावकों का मानना है कि जहां आमतौर पर बच्चों का वीकेंड मोबाइल और टीवी के इर्द-गिर्द सिमट जाता है, वहीं फोटो वॉक उन्हें खुली हवा, हरियाली और रचनात्मक माहौल देती है।
बच्चों को मिलता है एक्सप्लोर करने का मौका

‘फोटोग्राफी फार किड्स’ की कोच और फाउंडर प्रिया गोस्वामी बताती हैं कि ‘पाज, क्लिक एंड रिफ्लेक्ट’ खास तौर पर बच्चों के लिए क्यूरेट की गई फोटो वॉक है, जिसे पिछले चार सालों से दिल्ली-एनसीआर में आयोजित कर रही हूं।

इस कार्यशाला में 7 से 15 साल तक के बच्चे भाग लेते हैं और वॉक और टूर के जरिए सीखते हैं। कैमरे या स्मार्टफोन से वो दुनिया को नए नजरिये से एक्सप्लोर करते हैं। इसका मकसद बच्चों की कल्पनाशक्ति जगाना, सोचने-समझने की क्षमता निखारना, परखने और अभिव्यक्ति की कला विकसित करना और पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।

बच्चों की उत्सुकता देखकर बेहद खुशी मिलती है, और अभिभावकों को यह सुकून रहता है कि उनके बच्चे रचनात्मक ढंग से कुछ सीख रहे हैं। मकसद है कि बच्चे सिर्फ तस्वीरें न लें, बल्कि अपने आसपास की दुनिया को समझें और महसूस करें। चार जनवरी को सुंदर नर्सरी में अगली फोटो वॉक आयोजित होगी।

कुल मिलाकर इन फोटो वॉक में रील्स की चकाचौंध से बाहर निकलकर ये छोटे फोटोग्राफर रियल दुनिया की खूबसूरती को खोजते हैं- जहां हर क्लिक सिर्फ एक तस्वीर नहीं, एक एहसास, एक सीख और एक याद बन जाता है।
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