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गुदगुदी होने पर दिमाग में ऐसा क्या होता है कि हम हंसने लगते हैं? यहां समझें इसका साइंस

deltin33 2025-12-19 17:03:39 views 753
  

गुदगुदी होने पर हम हंसने क्यों लगाने लगते हैं? (Image Source: AI-Generated)  



लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। गुदगुदी एक बहुत ही अजीब एहसास है क्योंकि यह आपकी इच्छा पर निर्भर नहीं करता। जी हां, आप खुद यह तय नहीं करते कि आपको हंसना है या नहीं, आपका शरीर बस प्रतिक्रिया देता है। आपके मस्तिष्क को यह समझने का मौका भी नहीं मिलता कि कुछ मजेदार हुआ है, उससे पहले ही आपकी हंसी फूट पड़ती है (Why Do We Laugh When Tickled)। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

दरअसल, गुदगुदी के दौरान आप एक साथ छटपटाते हैं, नियंत्रण खो देते हैं और हंसते हुए विरोध भी करते हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि आप खुद को गुदगुदी नहीं कर सकते। यह विरोधाभास ही गुदगुदी की असली कहानी बयां करता है। आइए इस आर्टिकल में इसके दिलचस्प विज्ञान (Science of Tickling) को समझते हैं।

  

(Image Source: AI-Generated)
यह केवल हंसी नहीं, जुड़ाव का जरिया है

लंबे समय तक गुदगुदी को सिर्फ एक हल्की-फुल्की हंसी वाली प्रतिक्रिया माना जाता था, लेकिन वैज्ञानिकों ने पाया है कि यह व्यवहार जीवन की शुरुआत में ही विकसित हो जाता है और केवल इंसानों तक सीमित नहीं है। \“PLOS One\“ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, जब चूहों को धीरे से गुदगुदाया गया, तो उन्होंने खुशी और सामाजिक खेल से जुड़ी विशेष आवाजें निकालीं। वे चूहे बार-बार उन शोधकर्ताओं के पास वापस आए जिन्होंने उन्हें गुदगुदाया था। इससे पता चलता है कि गुदगुदी हंसी-मजाक के लिए नहीं, बल्कि आपसी जुड़ाव के लिए विकसित हुई है।
हंसी और डर का फैसला करता है शरीर

गुदगुदी शरीर के उन हिस्सों पर की जाती है जो सबसे नाजुक और खुले होते हैं, जैसे पसलियां, पेट और गर्दन। किसी वास्तविक खतरे की स्थिति में इन जगहों पर स्पर्श गंभीर हो सकता है। हमारा नर्वस सिस्टम पहले रिएक्शन देता है, लेकिन हंसी तब आती है जब हमारा दिमाग यह पहचान लेता है कि छूने वाला व्यक्ति सुरक्षित और परिचित है।

इस स्थिति में हंसी एक संकेत बन जाती है, जो आस-पास के लोगों को बताती है कि यह संपर्क खतरनाक नहीं है। विकासवाद के नजरिए से यह प्रतिक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि इसने बिना किसी संघर्ष के इंसानों को करीब आने और शारीरिक तालमेल बिठाने में मदद की।

  

(Image Source: AI-Generated)
हम खुद को गुदगुदी क्यों नहीं कर सकते?

खुद को गुदगुदी करने की कोशिश हमेशा नाकाम रहती है क्योंकि हमारा दिमाग उन गतिविधियों को पसंद नहीं करता जो वह खुद पैदा करता है। हमारा मस्तिष्क हमारे हर कदम या हलचल का अनुमान उसे करने से कुछ मिलीसेकंड पहले ही लगा लेता है। गुदगुदी का पूरा असर \“अनिश्चितता\“ पर निर्भर करता है। जब कोई दूसरा व्यक्ति हमें छूता है, तो उसमें एक सरप्राइज होता है, जो प्रतिक्रिया को जन्म देता है। यह हमें अकेले रहने के बजाय दूसरों के साथ बातचीत करने के लिए प्रेरित करता है।
शुरुआती मानव विकास में गुदगुदी

भाषा के विकसित होने से बहुत पहले, स्पर्श ही संवाद का मुख्य जरिया था। माता-पिता या देखभाल करने वाले लोग खेल-खेल में गुदगुदी का इस्तेमाल यह बताने के लिए करते थे कि वे सुरक्षित हैं। इसने बच्चों को यह सीखने में मदद की कि अचानक होने वाले शारीरिक स्पर्श हमेशा खतरा नहीं होते। इसके अलावा, इसने रिश्तों में सीमाओं को समझना भी सिखाया। यानी जब हंसी परेशानी में बदलने लगती, तो बड़ों को रुकना पड़ता था।

  

(Image Source: AI-Generated)
रिश्तों को मजबूत करने वाला \“सोशल ग्लू\“

हंसी किसी भी समूह के माहौल को तुरंत बदल देती है और तनाव को कम करती है। शुरुआती मानव समुदायों में, जहां लोग एक-दूसरे के बहुत करीब रहते थे, गुदगुदी से पैदा होने वाली हंसी ने सामाजिक घर्षण को कम करने और आपसी रिश्तों को मजबूत करने का काम किया। जिन समूहों में भरोसा ज्यादा था, उनके जीवित रहने की संभावना भी अधिक थी क्योंकि वे भोजन और सुरक्षा साझा करते थे। इस तरह गुदगुदी केवल ऊर्जा की बर्बादी नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाला गोंद थी।
विश्वास की एक मूक परीक्षा

गुदगुदी के लिए समर्पण की आवश्यकता होती है। आप किसी को अपने इतना करीब आने देते हैं कि वह कुछ देर के लिए आप पर हावी हो सके। यह तभी संभव है जब अटूट विश्वास हो। जैसे ही भरोसे की सीमा टूटती है, हंसी गायब हो जाती है और उसकी जगह बेचैनी ले लेती है। विकासवाद ने गुदगुदी को सुरक्षा की एक मूक परीक्षा में बदल दिया है। आप किसके साथ हंसते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किसके साथ सुरक्षित महसूस करते हैं।

आज की आधुनिक जीवनशैली भले ही बदल गई हो, लेकिन हमारा नर्वस सिस्टम अब भी पुराना ही है। गुदगुदी आज भी परिवारों, साथियों और करीबी दोस्तों के बीच उसी जुड़ाव को बनाए रखती है। यह हमें याद दिलाती है कि इंसान स्पर्श, खेल और साझा भावनाओं के माध्यम से जुड़ने के लिए बना है। हम कभी भी अकेले जीने के लिए नहीं बने थे।

Source: National Center for Biotechnology Information

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