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बीते वर्ष की विदाई, नए का स्वागत पीठा के साथ: बिहार की परंपरा, स्वाद और सेहत का संगम

LHC0088 2025-12-19 15:37:11 views 555
  

पारंपरिक व्यंजन है पीठा



जागरण संवाददाता, पटना। बिहार की सांस्कृतिक परंपराओं में कुछ ऐसे व्यंजन हैं, जो सिर्फ स्वाद तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समाज, ऋतु और जीवनशैली से गहराई से जुड़े होते हैं। ऐसा ही एक पारंपरिक व्यंजन है पीठा, जो बीते वर्ष की विदाई और नए वर्ष के स्वागत का प्रतीक माना जाता है। हर साल 31 दिसंबर को मनाया जाने वाला पीठा दिवस अब बिहार की लोक-संस्कृति में खास पहचान बना चुका है। यह परंपरा धीरे-धीरे घरों से निकलकर समाज और सार्वजनिक मंचों तक पहुंच रही है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

पीठा मूल रूप से बिहार का एक घरेलू व्यंजन है, जिसे विशेष रूप से पूस महीने में बनाया जाता है। लंबे समय तक यह घर-घर तक सीमित रहा और ठेठ देसी रेसिपी के रूप में ही जाना गया, लेकिन अब इसकी पहचान स्थानीय व्यंजन के रूप में मजबूत हो रही है।

दैनिक जागरण की पहल के बाद तीन वर्ष पूर्व पीठा दिवस मनाने की शुरुआत हुई, जिसने इस पारंपरिक व्यंजन को नया मंच दिया। अब हर साल बड़ी संख्या में लोग इस दिन पीठा बनाकर पुराने वर्ष को विदा और नए वर्ष का स्वागत करते हैं।

पीठा बिहार के मगध, मिथिला, अंग और भोजपुर क्षेत्र में अलग-अलग रूपों में लोकप्रिय है। उत्तर बिहार में इसे कई जगह खाबिया भी कहा जाता है।

चावल से बनने वाला यह व्यंजन स्वाद के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, पीठा शरीर को ऊर्जा देने के साथ पाचन तंत्र को मजबूत करता है।

पटना आयुर्वेद कॉलेज के चिकित्सक डॉ. सुशील बताते हैं कि पुराने समय में पीठा गरीब से गरीब व्यक्ति का भी भोजन रहा है। नए धान के चावल से बना पीठा आसानी से पच जाता है और ठंड के मौसम में शरीर को गर्मी प्रदान करता है।

पीठा बनाने की प्रक्रिया भी इसकी खासियत है। नए चावल को पीसकर आटा तैयार किया जाता है। इसमें स्वाद के अनुसार गुड़, चीनी, तिल, नारियल, खोया, दाल, आलू या सब्जी की भरावन की जाती है। फिर इसे गर्म पानी या भाप में पकाया जाता है।

आयुर्वेद के अनुसार, भाप में पका भोजन सुपाच्य होता है। पीठा में फाइबर, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं, जो शरीर में कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं।

आज के समय में पीठा सिर्फ घरों तक सीमित नहीं रहा। पटना समेत कई शहरों में अब होटल और रेस्तरां के मेन्यू में भी इसे जगह मिलने लगी है।

राजा बाजार, पटना म्यूजियम के पास और अन्य इलाकों में लोग खासतौर पर पीठा खरीदने पहुंचते हैं। इससे न केवल परंपरा जीवित रह रही है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं।

स्वाद के लिहाज से पीठा देश के अन्य राज्यों के पारंपरिक व्यंजनों से भी मेल खाता है। दक्षिण भारत में इडली, उत्तर प्रदेश में फुलौरी और अन्य राज्यों में अलग-अलग नामों से इसी तरह के स्टीम फूड प्रचलित हैं।

आयुर्वेद के अनुसार, स्टीम फूड स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है, लेकिन मधुमेह रोगियों को चावल और गुड़ के अधिक सेवन से बचने की सलाह दी जाती है।

पीठा दिवस अब केवल एक व्यंजन तक सीमित नहीं, बल्कि यह बिहार की सांस्कृतिक पहचान, परंपरा और सामूहिकता का प्रतीक बन गया है। यह नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का भी माध्यम है।

बीते वर्ष को विदा करने और नए साल का स्वागत करने का यह मीठा और सादा तरीका बिहार की आत्मा को दर्शाता है, जहां स्वाद के साथ संस्कार भी परोसे जाते हैं।
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