सुप्रीम कोर्ट।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि बिना किसी छूट के आजीवन कारावास की सजा देने का अधिकार केवल संवैधानिक अदालतों को प्राप्त है, सत्र न्यायालयों को नहीं। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्ला और के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि सत्र न्यायालय द्वारा सजा में छूट या कमी करने के अधिकार को सीमित नहीं किया जा सकता है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें
सत्र न्यायालय द्वारा आजीवन कारावास की सजा को जीवनभर के लिए निर्धारित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि यह निर्देश दंड प्रक्रिया संहिता के प्रविधानों के विपरीत होगा।
पीठ ने कहा-माफी या सजा कम करने की राज्य को दी गई शक्ति को छीना नहीं जा सकता। निचली अदालत द्वारा दी गई और उच्च न्यायालय द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत अपराध के लिए पुष्टि की गई सजा को आजीवन कारावास के रूप में मंजूरी दी जाती है।
शीर्ष अदालत एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें एक व्यक्ति ने यौन संबंध बनाने से इन्कार करने पर एक विधवा की आग में जलाकर हत्या कर दी थी। मामले में निचली अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी और सजा में छूट देने से इन्कार कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रश्न पर ध्यान केंद्रित करते हुए नोटिस जारी किया था कि क्या निचली अदालत द्वारा आजीवन कारावास की सजा देना उचित था, जिसका अर्थ था कि यह उसके जीवन के अंत तक लागू रहेगा और उसे दंड प्रक्रिया संहिता के तहत सजा में छूट नहीं देने का निर्देश दिया था।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ) |
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