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बिहार: भागलपुर में सफेद रसगुल्ला बनाम गुलाब जामुन की दिलचस्प सियासी जंग

deltin33 2025-12-15 20:12:57 views 586
  

Bhagalpur politics in Bihar : प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर



संजय कुमार सिंह, भागलपुर। Bhagalpur politics in Bihar : गंगा पार इस बार चुनाव नहीं, पूरा हलवाई-महोत्सव लगा है। गुलाब जामुन महाशय पहले ही अपनी चाश्नी में डूबकर बड़ा खेल कर चुके थे, लेकिन सफेद रसगुल्ला बाबू को भी लगता था कि हर बार भूरा-काला हीरो क्यों बने। सो, उन्होंने अपने फूले-फूले दल के साथ शोर मचाया कि उनकी जमात का एक सदस्य बागी बन बैठा है और रात को दुश्मनों की कड़ाही में घूम आया है। लोगों ने पहले यकीन नहीं किया। भला कोई रसगुल्ला भी गद्दार हो सकता है? पर फोटो खिंचवा देने से बढ़कर सबूत और क्या। शिकायत जब खाकी के पहरेदार तक पहुंची, तो पहरेदार ने सफेद रसगुल्ले को आंख दबाकर इशारा किया। चलो, अब बागी को खदेड़ो। बस, जो रसगुल्ला कल तक मीठा था, आज तीखेपन की चादर ओढ़कर हर रोज हमला बोल रहा है। अब तो गुलाब जामुन को देख लेने की धमकियां भी दे रहा है। मिठाइयों की इस सियासत में बाहर से मुलायम, अंदर से पूरा तिकोना ड्रामा छुपा है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें
इस गली में भी आ जाओ

नेताजी जब चुनाव से पहले मोहल्ले में आते थे तो ऐसे चलते थे जैसे धरती पर उतरकर तारे चुनकर दे देंगे। बयान भी ऐसा ठोका, जब तक इलाके की हर समस्या का समाधान नहीं कर दूं, न माला पहनूंगा, न स्वागत लूंगा। भोली जनता ने इसे भीष्म प्रतिज्ञा समझकर माथे पर चिपका लिया अबकी तो हमारा मसीहा आया। खैर, मेहनत रंग लाई और नेताजी जीत गए। बस जीतते ही चाल बदल गई। पहले जो पैदल चलते-चलते घर-घर चौखट पर दस्तक देते थे, अब आभार यात्रा पर एयर-कंडीशंड गाड़ी की छत पर चढ़कर हाथ हिला रहे थे, जैसे कह रहे हों वोट दे दिया न? अब पांच साल अपने हाल पर रहो। सबसे पहले जिस समस्या को हल करना था, उसे भूलकर पार्क का शुल्क घटाने की घोषणा कर दी। मोहल्ले की बड़ी-बड़ी दिक्कतें बेचारी हो गई। अब लोग पुकारते फिर रहे हैं। नेता जी, इस गली में भी आ जाओ। पर नेताजी गली में नहीं, गाड़ी में ही मिलते हैं। हाथ हिलाते हुए, वादे उड़ाते हुए।
अब बेचारे लहर गिन रहे

कल तक भोकाल काटते फिरने वाले नेताजी आज ऐसे गायब हैं जैसे चुनाव बाद वादे ढूंढ़ो तो भी न मिलें। जो खुद को सुर्खियों में रखने के लिए अंडरवियर तक की ब्रांडिंग करा लेते थे, वे अब खुद ही खोजे जा रहे हैं। चुनाव से पहले मोहल्ले में रोज पैदल घूमकर वोट की ऐसी चिरौरी करते थे मानो जनता उनकी नहीं, वे जनता के पीछे वोटर लोन लेकर भाग रहे हों। लोगों ने भी बड़े प्यार से कहा, नेताजी, चिंता मत करिए, सब आपके ही हैं। नेताजी को लगा मौसम चाहे आंधी का हो या ओले का, जनता हमेशा जेब में बंधी रहेगी। लेकिन मौका मिलते ही जनता ने ऐसी चाल चली कि नेताजी का पूरा भोकाल हवा में उड़ गया। फार्म में रहते हुए उन्हें लगता था कि इलाके की किस्मत उनकी उंगली पर घूमती है, पर जैसे ही नतीजे आए, नेताजी किनारे लग गए। अब बेचारे नेताजी गंगा किनारे बैठकर लहरें गिन रहे हैं, सोचते हुए, कहां गया भोकाल… और कहां गई मेरी जनता?
बागी बने, आशीर्वाद ले रहे

चुनाव खत्म होते ही राजनीति का रंगमंच फिर नए तमाशे के साथ सज गया। जो बागी चुनाव के दौरान आग उगलते घूम रहे थे, वही अब सरकार के गलियारों में गुलदस्ता लेकर ऐसे टहल रहे हैं मानो सत्ता की खुशबू उन्हीं के इशारे पर चलती हो। उधर, जिन्होंने घर-घर जाकर मेहनत की, पसीना बहाया, वोटरों को मनाया। वे अब सिर्फ आक्रोश में खौल रहे हैं, पर कुछ कर नहीं पा रहे। दिलचस्प दृश्य तब बनता है जब टिकट कटते ही एक नेताजी बागी बनकर मैदान में कूद पड़े, और दूसरे साहब टिकट न मिलने पर लालटेन वाले उम्मीदवार की सेवा में ऐसे लगे जैसे वही उनके कुलदेवता हों। रातदिन जनसम्पर्क और पूरी ताकत झोंक दी। लेकिन नतीजे आते ही बागी बाबू ने बगावत की पोटली समेटी, गुलदस्ता उठाया और पार्टी का सच्चा सिपाही बनकर नेताओं के आशीर्वाद की लाइन में लग गए। इंटरनेट मीडिया पर अपनी फोटो डालकर वे मानो चेतावनी दे रहे हैं। हमपर कोई हाथ नहीं डाल सकता। बाकी नेता तस्वीरें देखकर खुद से पूछ रहे हैं। क्यों की इतनी मेहनत?
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