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विहिप ने अल्पसंख्यक आरक्षण पर पुनर्विचार की उठाई मांग, संतों की बैठक में लिया देशव्यापी विमर्श का फैसला

LHC0088 2025-12-11 10:07:12 views 884
  

विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार। जागरण



जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। अल्पसंख्यक आरक्षण को पुन: परिभाषित करने की मांग को लेकर विहिप ने बड़े स्तर पर देशभर में सार्वजनिक विमर्श को खड़ा करने का निर्णय किया है। धर्म के आधार पर किसी भी भेदभाव को अस्वीकार करने वाली संवैधानिक व्यवस्था में आरक्षण आधार पर भेदभाव को खत्म करने की मांग को आगे बढ़ाने के साथ ही 18 से 20 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले मुस्लिम समुदाय को अल्पसंख्यक के दायरे में रखे जाने पर सवाल होंगे। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें
225 संतों की बैठक में हुआ फैसला

यह निर्णय पंजाबी बाग स्थित नत्था सिंह वाटिका में विहिप के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल की दो दिवसीय बैठक में लिया गया। बुधवार को संपन्न हुए इस बैठक में हिन्दू समाज के विभिन्न पंथों के 225 वरिष्ठ संतों ने भाग लिया। विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि मुस्लिम व ईसाई मत को मानने वाले लोगों को धर्म के आधार पर कभी उत्पीड़न या भेदभाव नहीं सहना पड़ा है।

मुस्लिमों की जो आबादी वर्ष 2011 में 14 प्रतिशत तक थी, वह अब 18 से 20 प्रतिशत हो चुकी है। ऐसे में देश की दूसरी सबसे बड़ी बहुसंख्यक आबादी को अल्पसंख्यक बनाए रखना कितना उचित है। उन्हाेंने आगे कहा कि देश के संविधान में धार्मिक अल्पसंख्यकों को कुछ विशेषाधिकार दिए गए हैं।

यह आश्चर्य की बात है कि संविधान में धार्मिक अल्पसंख्यक की कोई परिभाषा नही दी गई है। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 में केंद्र सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह किसी भी धर्म को अल्पसंख्यक घोषित कर दे।
धार्मिक अल्पसंख्यक को किया जाए परिभाषित

केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल का सुनिश्चित मत है कि धार्मिक अल्पसंख्यक शब्द को परिभाषित किया जाए। इसमें यह भी विचार करना होगा कि क्या कोई धर्म ऐसा है जिसके मतावलंबियों को धर्म के आधार पर उत्पीड़न या भेदभाव सहन करना पड़ा हो। साथ ही इसकी भी पड़ताल होनी चाहिए कि क्या किसी धर्म के अनुयायी बाकी समाज से किसी भी क्षेत्र में पिछड़ गए है।

जबकि, देश में किसी भी काल में मुस्लिम और ईसाई धर्म को मानने वाले लोगों को धर्म के आधार पर कभी कोई उत्पीड़न या भेदभाव सहन नही करना पड़ा। वह बाकी समाज से पीछे नही है। उन्होंने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। हमारा संविधान धर्म के आधार पर किसी भी भेदभाव को अस्वीकार करता है।
न्यायपालिका पर अनुचित दबाव है महाभियोग

तमिलनाडु उच्च न्यायालय के जज जीआर स्वामीनाथन पर हिंदू हित का निर्णय देने पर डीएमके और शिवसेना उद्धव गुट के सहयोग से उन्हें हटाने के लिए संसद में महाभियोग लाने के प्रस्ताव की भी चर्चा मार्गदर्शक मंडल में हुई।

अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जीतेन्द्रानंद सरस्वती ने कहा कि किसी न्यायाधीश के निर्णय के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है। पर महाभियोग लाना तो न्यायपालिका पर अनुचित दवाब बनाने का प्रयत्न है, जिसकी निंदा की जानी चाहिए। पूर्व में कई निर्णय हिंदू मान्यताओं और भावनाओं के विरूद्ध आए तो क्या उसे भी गैर हिंदुओं के दबाव में माना जाए।
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