तेहरान/वॉशिंगटन । खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच तेहरान ने एक बड़ा आर्थिक और रणनीतिक कदम उठाया है। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलना शुरू कर दिया है। यह वही समुद्री मार्ग है, जहां से दुनिया की कुल तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। होर्मुज जलडमरूमध्य को वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है। ऐसे में ईरान का यह फैसला केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ईरान का अनुमान है कि इस नई व्यवस्था से उसे हर साल 40 से 50 अरब डॉलर तक की आय हो सकती है। इससे अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण कमजोर हुई उसकी अर्थव्यवस्था को राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। भारत ने तो बाकायदा तेल के लिए ईरान को युआन में पेमेंट भी किया है। वहीं अब यूएई ने भी अमेरिका को चेतावनी देने हुए चीनी युआन में पेमेंट की बात शुरू कर दी है।
डॉलर की जगह युआन में भुगतान की तैयारी
ईरान के इस कदम का सबसे चर्चित पहलू यह है कि वह टोल भुगतान अमेरिकी डॉलर के बजाय चीनी मुद्रा युआन में लेना चाहता है। माना जा रहा है कि इसका सीधा उद्देश्य वैश्विक तेल व्यापार में अमेरिकी डॉलर के दबदबे को चुनौती देना है। ईरानी संसद में इस योजना को औपचारिक रूप देने की प्रक्रिया चल रही है। इसके अलावा ईरान ने संकेत दिए हैं कि वह क्रिप्टोकरेंसी के जरिए भी भुगतान स्वीकार करेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो यह वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकता है।
चीनी युआन की बढ़ती वैल्यू
पिछले कुछ वर्षों में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले चीनी युआन का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा है। लेकिन साल 2026 में स्थिति बदल गई है। पिछले एक साल में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले चीनी युआन में 2 फीसदी से ज्यादा की तेजी आई है। वहीं ईरान युद्ध शुरू होने के बाद इसमें और मजबूती देखने को मिली है। 27 फरवरी से लेकर 8 अप्रैल तक अमेरिकी डॉलर के मुकाबले चीनी युआन में 0.50% की तेजी आई है।
क्या है पेट्रोडॉलर व्यवस्था?
दुनिया में तेल व्यापार लंबे समय से अमेरिकी डॉलर में होता आया है। इस व्यवस्था को “पेट्रोडॉलर सिस्टम” कहा जाता है। इसकी शुरुआत 1970 के दशक में हुई थी, जब अमेरिका और सऊदी अरब के बीच एक समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत सऊदी अरब ने तेल व्यापार केवल डॉलर में करने पर सहमति दी थी, जबकि अमेरिका ने सुरक्षा और सैन्य सहयोग देने का वादा किया था। बाद में ओपेक देशों ने भी इसी मॉडल को अपनाया और धीरे-धीरे डॉलर वैश्विक तेल व्यापार की मुख्य मुद्रा बन गया। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा अमेरिका को मिला। डॉलर को दुनिया की प्रमुख रिजर्व करेंसी का दर्जा मिला और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की पकड़ वैश्विक वित्तीय बाजारों पर मजबूत होती चली गई।
तेल से कमाई गई पूंजी ने मजबूत किया अमेरिका
तेल निर्यातक देशों ने पेट्रोडॉलर के जरिए कमाई गई बड़ी रकम को अमेरिकी बॉन्ड, शेयर बाजार, सिक्योरिटीज और निवेश कोषों में लगाया। इससे अमेरिकी वित्तीय बाजारों को स्थिरता और मजबूती मिली। सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि कई तेल उत्पादक देशों को भी इसका लाभ हुआ। कतर और नॉर्वे जैसे गैर-ओपेक देशों ने भी डॉलर आधारित तेल व्यापार से अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत किया। लेकिन अब ईरान इस स्थापित व्यवस्था को बदलने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
‘पेट्रोयुआन’ की ओर बढ़ती दुनिया?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान की योजना सफल होती है और खाड़ी के अन्य देश भी युआन में भुगतान स्वीकार करने लगते हैं, तो यह “पेट्रोयुआन” व्यवस्था की शुरुआत हो सकती है। यूएई, सऊदी अरब, कतर, कुवैत और बहरीन जैसे देशों की भूमिका इस मामले में बेहद अहम मानी जा रही है। यदि ये देश भी युआन आधारित लेनदेन को अपनाते हैं, तो डॉलर की वैश्विक पकड़ कमजोर हो सकती है। अर्थशास्त्री एंटोनियो भारद्वाज के अनुसार यह पेट्रोडॉलर व्यवस्था के धीरे-धीरे कमजोर होने का संकेत है। उनका मानना है कि भविष्य में युआन वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए एक वैकल्पिक भुगतान प्रणाली के रूप में उभर सकता है।
वैश्विक तेल बाजार दो हिस्सों में बंटने की आशंका
अंतरराष्ट्रीय मामलों की विशेषज्ञ पाकीजा परवीन का कहना है कि ईरान की यह नीति वैश्विक तेल बाजार को दो अलग-अलग हिस्सों में बांट सकती है। उनके मुताबिक ईरान समर्थक या चीन के करीब माने जाने वाले देश युआन में भुगतान करके होर्मुज मार्ग का इस्तेमाल कर सकते हैं, जबकि अन्य देशों को डॉलर आधारित व्यापार में अधिक लागत और दबाव का सामना करना पड़ सकता है। इससे वैश्विक व्यापार में नई आर्थिक प्रतिस्पर्धा शुरू होने की संभावना भी जताई जा रही है।
दुनिया में बदल रहे आर्थिक संकेत
हाल के वर्षों में दुनिया की आर्थिक तस्वीर तेजी से बदलती दिखाई दे रही है। रिपोर्टों के मुताबिक 1996 के बाद पहली बार वैश्विक केंद्रीय बैंकों के भंडार में अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की तुलना में सोने की हिस्सेदारी अधिक हो गई है।इसके अलावा ब्रिक्स देशों चीन, भारत और ब्राजील ने 2025 में अमेरिकी परिसंपत्तियों में अपनी हिस्सेदारी कम की है। इसे भी डॉलर पर निर्भरता घटाने की दिशा में उठाए गए कदम के रूप में देखा जा रहा है।
क्या बदल जाएगी वैश्विक आर्थिक व्यवस्था?
ईरान का यह कदम सिर्फ टोल वसूली तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे वैश्विक आर्थिक शक्ति संतुलन बदलने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। अगर तेल व्यापार में युआन का इस्तेमाल बढ़ता है, तो आने वाले वर्षों में अमेरिका की आर्थिक और रणनीतिक स्थिति पर असर पड़ सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि डॉलर की मजबूत पकड़ को चुनौती देना आसान नहीं होगा, लेकिन ईरान की यह पहल दुनिया में बदलते आर्थिक समीकरणों का संकेत जरूर दे रही है।

Editorial Team
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