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आखिर कैसे पहली बार पश्चिम बंगाल की सत्ता पर ...

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'अंग' यानी बिहार और 'कलिंग' यानी ओडिशा का मोर्चा तो बीजेपी ने पहले ही फतह कर लिया था. अब बंगाल में चुनावी जीत के साथ ही अंग, बंग और कलिंग पर काबिज होने का भारतीय जनता पार्टी का सपना पूरा हो गया है.  
इस बार के विधानसभा चुनाव में मुकाबला 'बदला' बनाम 'बदलाव' था. बीजेपी ने जहां बदलाव का नारा देते हुए अपने पारंपरिक 'जय श्री राम' की जगह 'जय मां काली' के नारे को अपनाया था, वहीं ममता बनर्जी ने लोगों से केंद्र, बीजेपी और चुनाव आयोग के कथित सौतेले रवैए के खिलाफ बदला लेने के लिए वोट डालने की अपील की थी.  




पश्चिम बंगाल में इस बार विधानसभा चुनाव में कई चीजें पहली बार हुई थीं और इसका नतीजा भी पहली बार बीजेपी की जीत के तौर पर सामने आया है. बीते पच्चीस वर्षों में पहली बार कोई चुनाव दो चरणों में कराया गया है. इससे पहले छह से आठ चरणों में मतदान कराया जाता रहा है. इसके अलावा भारी तादाद में तैनात केंद्रीय बल, और एसआईआर के दौरान कटे करीब 91 लाख नामों में राजनीतिक दलों के समीकरण गड़बड़ा दिए हैं. बंगाल में बीते कई दशकों में पहली बार चुनावी हिंसा न के बराबर हुई है. इससे पहले, यहां पर चुनाव से पहले और बाद में भारी हिंसा होती रही है.  




इस बार राज्य में पहली बार रिकार्डतोड़ वोट पड़े थे. उसके बाद से ही सत्ता के दावेदार अपने-अपने तरीके से इसकी व्याख्या करने में जुटे थे. इस बार चुनाव से पहले मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण यानी एसआईआर सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा है. यह कहना ज्यादा सही होगा कि एसआईआर के मुद्दे ने अबकी तमाम पारंपरिक मुद्दों को पीछे छोड़ दिया. चुनावी नतीजों से साफ है कि बीजेपी को ममता बनर्जी के मुस्लिम और महिला वोट बैंक में भी सेंध लगाई है. पार्टी को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने में कामयाबी मिली. इसी के कारण हिंदू तबके के वोटरों ने एकजुट होकर बीजेपी के पक्ष में मतदान किया.  




बीजेपी भी इस बात को स्वीकार करती है. पार्टी के प्रमुख नेता शुभेंदु अधिकारी ने डीडब्ल्यू से कहा, "ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टिकरण नीति के खिलाफ हिंदू समुदाय ने एकजुट होकर हमारे पक्ष में मतदान किया है.खासकर शहरी तबके के लोगों का सरकार से मोहभंग हो गया था. उन्होंने बदलाव के लिए वोट डाला था."  
क्या रही बीजेपी की जीत की वजहें?  
करीब दस साल की कोशिश के बाद पहली बार बंगाल में बीजेपी की जीत की आखिर क्या वजह रही? राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इसमें एसआईआर के दौरान भारी तादाद में कटे नामों की अहम भूमिका रही. इसके अलावा धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण, बीजेपी के आक्रामक प्रचार, आर.जी. कर कांड के बहाने महिला सुरक्षा के सवाल, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ने भी बदलाव की राह तैयार की.  




पश्चिम बंगाल चुनाव: दूसरे दौर में मतुआ समुदाय की भूमिका अहम  
खासकर शहरी इलाकों में धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण के अलावा ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी का असर साफ नजर आया. इसके अलावा पहली बार वोटर बने युवाओं ने भी सरकार के कामकाज के खिलाफ वोट डाले. यही वजह है कि तृणमूल कांग्रेस का गढ़ समझे जाने वाले कोलकाता और इसके आस-पास के शहरी इलाको में भी बीजेपी का प्रदर्शन बेहतर रहा.  
राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्मभूमि होने की वजह से बंगाल बीजेपी के लिए काफी अहम था. उनकी 125वीं जयंती के मौके पर मिली इस जीत की पार्टी के लिए काफी अहमियत है. इस चुनाव ने पार्टी के सामने करो या मरो पैदा कर दी थी. यही वजह है कि पिछली बार की गलतियों से सबक लेते हुए उसने चुनाव में अपने तमाम संसाधन तो झोंके ही, ममता पर सीधा हमला करने या ऐसी कोई टिप्पणी करने से बचती रही जिससे बंगालियों की भावनाएं आहत हो सकती थी. इसी वजह से उसने अभियान के दौरान जय श्री राम से ज्यादा जय मां काली के नारे लगाए."  

एक अन्य विश्लेषक और सिलीगुड़ी के एक कालेज में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर रहीं शुभांगी चटर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "सिलीगुड़ी में चिकन नेक कॉरिडोर की अहमियत को ध्यान में रखते हुए बीजेपी का सत्ता में आना इस सीमावर्ती राज्य के लिए काफी अहम है. इसकी सीमाएं बांग्लादेश के अलावा नेपाल और भूटान से तो मिलती ही हैं, चीनी सीमा भी ज्यादा दूर नहीं है."  
राष्ट्रीय राजनीति पर जरूर पड़ेगा असर  
इस जीत का देश की भावी राजनीति की दशा-दिशा पर क्या असर होगा? कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार पुलकेश घोष डीडब्ल्यू से कहते हैं, "तृणमूल कांग्रेस अकेली ऐसी राजनीतिक ताकत थी जो अपने बूते बीजेपी को कड़ी टक्कर देते नजर आती थी. अब उसके कमजोर होने का असर 2029 के लोकसभा चुनाव पर भी नजर आएगा."  

उनका कहना था कि तृणमूल कांग्रेस की गलतियां भी इस हार की जिम्मेदार हैं. उसके तमाम शीर्ष नेता चुनाव प्रचार के दौरान चार मई के बाद सबको देख लेने की धमकी देते रहे. खुद ममता ने भी कई बार यह बात दोहराई थी. इससे लोगों के मन में डर पैदा हुआ कि शायद चुनाव के बाद बड़े पैमाने पर हिंसा हो. इसी वजह से लोगों ने बदलाव के लिए खुलकर मतदान किया.  
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बीजेपी के लिए बंगाल की जीत महज एक राज्य की जीत नहीं है बल्कि इसके दूरगामी नतीजे होंगे. इस जीत ने पूर्वी भारत में ओडिशा के बाद क्षेत्रीय पार्टी के दूसरे सबसे बड़े किले को ढहाने में कामयाबी दिलाई है. ऐसे में इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ना तय है.






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