नई दिल्ली। दुनियाभर में फंगल संक्रमणों का खतरा अब और गंभीर होता जा रहा है, क्योंकि कई प्रकार के फंगस दवाओं के प्रति तेजी से प्रतिरोधक (रेजिस्टेंट) बनते जा रहे हैं। एक नए अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यह स्थिति खासकर कमजोर इम्यून सिस्टम वाले मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है।
नेचर मेडिसिन में प्रकाशित एक पेपर के मुताबिक, नीदरलैंड्स में रेडबाउड यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर (रेडबाउडमक) के मेडिकल माइक्रोबायोलॉजिस्ट और प्रोफेसर पॉल वर्वीज के नेतृत्व में 16 संगठनों के 50 वैज्ञानिकों ने मिलकर काम किया।
शोधकर्ताओं ने वैश्विक आंकड़ों के आधार पर फंगल रेजिस्टेंस से निपटने के लिए पांच-स्तरीय रणनीति तैयार की है। इसमें जागरूकता बढ़ाना, निगरानी मजबूत करना, संक्रमण नियंत्रण, दवाओं का संतुलित उपयोग और इस क्षेत्र में निवेश बढ़ाना शामिल है।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि फंगस में दवा-प्रतिरोध अस्पतालों में नहीं, बल्कि मुख्य रूप से पर्यावरण में विकसित होता है। कृषि में इस्तेमाल होने वाले फफूंदनाशक (फंगीसाइड्स) और चिकित्सा में उपयोग होने वाली एंटीफंगल दवाएं संरचना में काफी समान होती हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से फंगस इन दवाओं के खिलाफ प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं और फिर हवा के जरिए फैलते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह स्थिति “वन हेल्थ” (वन हेल्थ) दृष्टिकोण की जरूरत को रेखांकित करती है, जिसमें मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण और कृषि—तीनों को साथ लेकर रणनीति बनाई जाए।
अध्ययन में खास तौर पर कैंडिडा ऑरिस और एस्परगिलस तक जैसे खतरनाक फंगल संक्रमणों का जिक्र किया गया, जो अस्पतालों और समुदाय दोनों में तेजी से फैल रहे हैं और इलाज को मुश्किल बना रहे हैं।
माइकेला लैकनर ने कहा कि कृषि और स्वास्थ्य क्षेत्र में एंटीफंगल दवाओं के दोहरे इस्तेमाल को संतुलित करना जरूरी है। साथ ही, नए एंटीफंगल उपचार और सस्ती जांच तकनीकों में निवेश बढ़ाना समय की मांग है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि इस बढ़ते खतरे को जल्द नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस जैसी वैश्विक स्वास्थ्य संकट की पुनरावृत्ति कर सकता है।
--आईएएनएस
केआर/

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