राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से हिमालयन कल्चरल सेंटर में सोमवार को आयोजित प्रमुखजन गोष्ठी में विचार रखते सरसंघचालक डा. मोहन भागवत। जागरण
अश्वनी त्रिपाठी, देहरादून। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत ने पूर्व सैनिकों के साथ संवाद में सामाजिक समरसता को सर्वोपरि बताया।
उन्होंने कहा, दो हजार वर्षों तक अस्पृश्यता और भेदभाव झेलने के बाद भी हिंदू समाज के एक हिस्से ने कभी देश के साथ गद्दारी नहीं की।
इस वर्ग को समाज में बराबरी का स्थान देने के लिए यदि दो सौ वर्ष भी आरक्षण देना पड़े, तो तैयार रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि अपने भाइयों के उत्थान की खातिर आरक्षण देना पड़ेगा तो देंगे, अपनों के लिए नुकसान भी सहेंगे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से हिमालयन कल्चरल सेंटर में आयोजित प्रमुखजन गोष्ठी में सरसंघचालक डा. मोहन भागवत ने कहा, स्वतंत्रता के बाद कई राजनीतिक दल अपने मूल मार्ग से भटक गए हैं।
उन्होंने समाज की एकता पर बल देकर कहा कि सामाजिक शक्ति ही व्यक्तियों व नेतृत्व को बल प्रदान करती है। यदि समाज कमजोर है तो नेतृत्व प्रभावी नहीं हो सकता।
कहा कि वर्ष 1857 की क्रांति में पराजय का बड़ा कारण आपसी एकता का अभाव था। राजनीतिक जागरूकता व क्रांतिकारियों के संघर्ष से बाद में एकजुटता का भाव पैदा हुआ और देश आजाद हुआ।
विदेशी घुसपैठियों को रोजगार न दें
सरसंघचालक ने दो टूक कहा, विदेशी घुसपैठ को किसी भी कीमत पर स्वीकारा नहीं जाएगा। घुसपैठियों की पहचान स्पष्ट होनी चाहिए और देश में किसी भी विदेशी घुसपैठिये को रोजगार नहीं दिया जाना चाहिए। इसे उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा व देश की आर्थिकी से जुड़ा विषय बताया।
भारत-पाक के नागरिक रखें आपसी प्रेम
कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा बताते हुए उन्होंने कहा कि पाकिस्तान भारत के रिश्ते कैसे भी हों, लेकिन दोनों देशों के नागरिकों में सद्भावना होनी चाहिए। उन्होंने कहा, पाकिस्तान का सब कुछ अच्छा रहेगा तो हमारा भी अच्छा रहेगा।
अच्छाई के लिए धर्म बदलने का नहीं विरोध
मतांतरण मुद्दे पर उन्होंने कहा, यदि किसी दूसरे मत में अच्छाई दिखती है तो मत परिवर्तन करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए, लेकिन लालच या दबाव के आधार पर धर्मांतरण रोकने के लिए कानून आवश्यक हो। उन्होंने स्वेच्छा से लौटने वालों का स्वागत करने की बात भी दोहराई।
आज जिनका विरोध, उन्हें भी कल जोड़ना है
सरसंघचालक ने हिंदू की व्याख्या करते हुए कहा कि भारत में कई पूजा पद्धतियां हैं। हमारा इनसे कोई विरोध नहीं है। सभी की रगों में एक ही खून है। सभी के पूर्वज एक हैं।
हिंदू बनने के लिए कुछ भी छोड़ना नहीं पड़ता, बस देश के साथ निष्ठा हिंदू होने की शर्त है। कहा, आज हम जिनके विरोध में हैं, उनको भी कल जोड़ना ही है। वो भी अपने ही हैं।
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