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उत्तराखंड में होली: सांस्कृतिक पहचान, प्राचीन परंपराएं और लोकगीतों का संगम

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बीना भट्ट, सेवानिवृत्त निदेशक, संस्कृति विभाग  



दिनेश कुकरेती, देहरादून। होली महज रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान है। भारतीय परंपरा में पर्व-त्योहार जीवन में आशा, आकांक्षा, उत्साह व उमंग का ही संचार नहीं करते, मनोरंजन, उल्लास व आनंद देकर जीवन को सरस भी बनाते हैं।

वसंत ऋतु में सूर्य के उत्तरायण होने पर फल-फूलों की नई सृष्टि के साथ ऋतु अमृतप्राण हो उठती है। इसलिए होली को ‘मन्वंतरांभ’ भी कहा गया और \“नवान्नवेष्टि यज्ञ’ भी।

फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के दिन प्राचीन आर्यजन नए गेहूं व जौ की बालियों से अग्निहोत्र का प्रारंभ करते थे, जिसे कर्मकांड परंपरा में ‘यवग्रहण यज्ञ’ का नाम दिया गया। संस्कृत में अन्न की बाल को ‘होला’ कहते हैं। जिस उत्सव में नई फसल की होला को अग्नि पर भूना जाता है, वही होली है।

सोमवार को दैनिक जागरण कार्यालय में ‘होली के रंग पहाड़ के संग’ विषय पर आयोजित अकादमिक विमर्श में बतौर विशेषज्ञ वक्ता संस्कृति विभाग की सेवानिवृत्त निदेशक बीना भट्ट ने ये बातें कहीं।
वसंत का संदेशवाहक राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व

बीना भट्ट बताती हैं कि होली आते ही देवभूमि राधा-कृष्ण के प्रणय गीतों से रोमांचित हो उठती है। होली प्रज्वलित करने से लेकर रंगों के खेलने तक उसका यही रूप जनमानस को आकर्षित करता है।

राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है। राग (संगीत) और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही, लेकिन इन्हें उत्कर्ष तक पहुंचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-विरंगे यौवन के साथ अपने चरम पर होती है।

फाल्गुन में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। होली का पर्व फाल्गुन पूर्णिमा को मनाया जाता है। पहले दिन होलिका दहन होता है, जबकि दूसरा दिन छलड़ी के नाम है।
शास्त्रीय रागों पर चार अलग-अलग चरणों में बैठकी होली का गायन

कूर्मांचल में शास्त्रीय रागों पर आधारित बैठकी होली गायन की परंपरा 150 से अधिक वर्षों से चली आ रही है। यह होली पीलू, भैरवी, श्याम कल्याण, काफी, परज, जंगला काफी, खमाज, जोगिया, देश विहाग, जै-जैवंती जैसे शास्त्रीय रागों पर चार अलग-अलग चरणों में गाई जाती है।

पहला चरण पौष के प्रथम रविवार को आध्यात्मिक होली ‘गणपति को भज लीजे मनवा’ से शुरू होकर माघ पंचमी के एक दिन पूर्व तक चलता है। माघ पंचमी से शिवरात्रि के एक दिन पूर्व तक दूसरे चरण में भक्तिपरक व शृंगारिक होली गीतों का गायन होता है।

तीसरे चरण में शिवरात्रि से रंगभरी एकादशी के एक दिन पूर्व तक हंसी-मजाक व ठिठोली युक्त गीत गाए जाते हैं। रंगभरी एकादशी से होली के टीके तक मिश्रित होली की स्वरलहरियां चारों दिशाओं में गूंजती रहती हैं।

चौथे चरण में बैठी के साथ खड़ी होली गायन का सिलसिला भी चल पड़ता है। इसे चीर बंधन वाले अथवा सार्वजनिक स्थानों पर लय-ताल में गाया जाता है।
उत्तराखंडी परंपरा में घुले ब्रज की होली के रंग

पहाड़ में होली गीत आए तो ब्रज से, लेकिन यहां ये लोक में घुलकर स्थानीय लोक परंपरा का अभिन्न अंग बन गए। यही विशेषता कुमाऊं की बैठी होली की भी है।

गढ़वाल अंचल के श्रीनगर, पौड़ी, टिहरी आदि इलाकों में भी होली का कुमाऊं जैसा स्वरूप ही दिखता है। गढ़वाल में होली को होरी कहा जाता है और सभी होरी गीतों में ब्रजमंडल के ही गीतों का गढ़वालीकरण किया हुआ लगता है।

हालांकि, गढ़वाल में प्रचलित होली गीतों में ब्रज की तरह कृष्ण-राधा या कृष्ण ही मुख्य विषय नहीं होते। यहां अंबा, शिव, ब्रह्मा, कृष्ण आदि कई विषयवस्तु के रूप में प्रयुक्त होते हैं।
बैठकी व खड़ी होली का मिश्रित रूप महिला होली

कुमाऊं की होली में ब्रज और उर्दू का प्रभाव साफ झलकता है। यहां प्रचलित होली के तीन भेद हैं। जैसे बैठ होली बैठकों में शास्त्रीय ढंग से गाई जाती है, तो खड़ी होली में ढोल-नगाड़ा होता है और पूरा समूह झोंक के साथ नाचता है।

महिला होली इन दोनों का मिश्रित रूप है। इसमें स्वांग भी है, ठुनक-मुनक भी है और गंभीर अभिव्यक्तियां भी। लेकिन, सबसे ज्यादा दिखता है देवर-भाभी का मजाक। जैसे-‘मेरो रंगीलो देवर घर ऐरों छो, कैं होणी साड़ी कैं होणी जंफर, मी होणी टीका लैंरो छो’।
आशीष के साथ होली की पूर्णता

गढ़वाल में होल्यार किसी गांव में प्रवेश करते हुए गीत \“खोलो किवाड़ चलो मठ भीतर’ गाते हुए नृत्य करते हैं। यह अत्यंत जोशीला नृत्य गीत है, जिसमें उल्लास के साथ शृंगार का भी समावेश हुआ है।

ऐसा ही नृत्य-गीतेय शैली का एक भजन गीत ‘हर हर पीपल पात, जय देवी आदि भवानी’ भी है, जिसमें उल्लास के साथ मां भवानी की स्तुति की जाती है।

शृंगार व दर्शन प्रधान गीत ‘चंपा-चमेली के नौ-दस फूला, पार ने गुंथी हार शिव के गले में बिराजे’ व ‘मत मारो मोहनलाला पिचकारी’ भी होली में प्रसिद्ध हैं। जब होल्यारों की टोली होली खेल चुकी होती है, तब आशीर्वाद वाला यह नृत्य-गीत गाया जाता है, \“हम होली वाले देवें आशीष, गावें-बजावें देवें आशीष। यहीं होली पूर्णता को प्राप्त करती है।   
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