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आपको भी अपनी काबिलियत पर होता है शक? (AI Generated Image)
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज के समय में हर कोई अपनी उपलब्धियों को सोशल मीडिया पर दिखा रहा है। ऐसे में एक अजीब सी मानसिकता युवाओं के बीच बढ़ रही है, जिसे इम्पोस्टर सिंड्रोम कहते हैं।
इसलिए अगर ऑफिस में प्रोमोशन मिलने के बाद आप खुद से सवाल कर रहे हैं कि आप इसके लायक हैं या नहीं?, तो यकीन मानिए आप अकेले नहीं है। दुनिया में कई लोग इस एहसास से गुजरते हैं। आइए जानें इसका मतलब क्या है और यह क्यों बढ़ रहा है।
क्या है इम्पोस्टर सिंड्रोम?
इम्पोस्टर सिंड्रोम कोई मानसिक बीमारी नहीं है, बल्कि एक बिहेवियरल पैटर्न है। इसमें व्यक्ति को अपनी क्षमताओं पर संदेह होता है। उन्हें लगता है कि उनकी सफलता उनकी मेहनत या काबिलियत की वजह से नहीं, बल्कि किस्मत या गलती से मिली है।
ऐसे लोग खुद को एक इम्पोस्टर यानी बहरूपिया महसूस करते हैं। उन्हें हर वक्त यह डर सताता रहता है कि जल्द ही उनका पर्दाफाश हो जाएगा और लोगों को पता चल जाएगा कि वे काबिल नहीं हैं।
क्यों होता है इम्पोस्टर सिंड्रो ?
- सोशल मीडिया और तुलना- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लोग केवल अपनी बेस्ट लाइफ और उपलब्धियां शेयर करते हैं। दूसरों की हाईलाइट रील देखकर युवा अपनी असल जिंदगी और संघर्ष की तुलना उनसे करने लगते हैं, जिससे हीन भावना पैदा होती है।
- परफेक्ट होने का दबाव- आज की कॉर्पोरेट दुनिया में परफेक्ट होने का भारी दबाव है। जब लोग अपनी छोटी-सी गलती पर भी खुद को कोसने लगते हैं, तो उन्हें लगने लगता है कि वे अपने पद के काबिल नहीं हैं।
- तेजी से बदलती तकनीक- तकनीक के क्षेत्र में हो रहे बदलावों के कारण लोगों को लगता है कि उन्हें सब कुछ नहीं पता। यह नॉलेज गैप उन्हें यह महसूस कराता है कि वे पीछे छूट रहे हैं।
- बचपन की परवरिश और उम्मीदें- जिन बच्चों पर बचपन से ही हमेशा फर्स्ट आने का दबाव होता है, वे बड़े होकर अपनी छोटी सी विफलता को भी बहुत बड़ा मान लेते हैं और सफल होने पर भी संतुष्ट नहीं हो पाते।
इसके लक्षण कैसे होते हैं?
(AI Generated Image)
- अपनी सफलता के लिए लक को क्रेडिट देना।
- छोटी-सी गलती पर भी बहुत ज्यादा घबराहट होना।
- नया काम हाथ में लेने से डरना।
- फेल्यिर का डर।
- खुद को साबित करने के लिए ज़रूरत से ज़्यादा काम करना।
- इसका सबसे बुरा असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है, जिससे एंग्जायटी, बर्नआउट और लो-कॉन्फिडेंस जैसी समस्याएं होने लगती हैं।
कैसे निपटें इम्पोस्टर सिंड्रोम से?
इस स्थिति से बाहर निकलने का पहला कदम यह स्वीकार करना है कि यह सिर्फ एक सोच है, हकीकत नहीं। अपनी छोटी-छोटी जीत को सेलिब्रेट करें। अपने काम का फीडबैक मांगें और यह समझें कि कोई भी इंसान हर चीज में परफेक्ट नहीं होता। गलतियां करना सीखने का एक हिस्सा है, आपकी नाकामी का प्रमाण नहीं।
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