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साक्ष्य के अभाव में 24 साल बाद फिरौती के लिए अपहरण का आरोपी बरी, बगहा नहीं जुटा पाई ठोस सबूत

Chikheang 3 hour(s) ago views 166
  

प्रतीकात्मक तस्वीर



जागरण संवाददाता, बगहा। बगहा उपकारा में बंद अपराधी योगेन्द्र चौधरी उर्फ योगेन्द्र मल्लाह को फिरौती के लिए अपहरण से जुड़े एक मामले में न्यायालय ने साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। घटना के करीब 24 वर्ष बीत जाने के बावजूद अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में विफल रहा।

अपर एवं सत्र न्यायाधीश चतुर्थ मानवेंद्र मिश्र की अदालत ने सुनवाई के दौरान अभियोजन की कार्यशैली पर गंभीर नाराजगी जताते हुए कहा कि जांच और पैरवी में लापरवाही के कारण गंभीर मामलों में भी आरोपितों को बरी करना पड़ रहा है।  

अदालत ने अपने निर्णय में टिप्पणी की कि अभियोजन पक्ष की सुस्त गति और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जाने से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है। न्यायालय ने कहा कि केवल घटना की चर्चा या आशंका के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि स्पष्ट और विश्वसनीय प्रमाण आवश्यक होते हैं।  

फैसले के साथ ही न्यायालय ने जांच और अभियोजन की जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
2002 में बस रोककर किया गया था सामूहिक अपहरण

मामले के अनुसार 29 नवंबर 2002 की सुबह वाल्मीकिनगर से एक यात्री बस बगहा के लिए रवाना हुई थी। जब बस चमईनवा मोड़ के समीप पहुंची तो चालक ने मुख्य सड़क पर गिरा पेड़ देखा और वाहन रोक दिया। इसी दौरान जंगल से निकले दर्जनों हथियारबंद अपराधियों ने बस को घेर लिया।  

अपराधियों ने चालक गोविंद प्रसाद उर्फ जयगोविंद बीन निवासी अरगना टोला थाना लौकरिया को हथियार के बल पर नीचे उतार लिया और बस में सवार सभी यात्रियों को जबरन जंगल की ओर ले गए। जंगल में यात्रियों के साथ मारपीट की गई तथा कुछ लोगों से पूछताछ के बाद रुपये और सामान छीनकर उन्हें छोड़ दिया गया, जबकि 14 लोगों को अपराधी अपने साथ आगे ले गए।  
चालक और मुक्त हुए यात्री वाल्मीकिनगर थाना पहुंचे

इनमें अधिकांश सिंचाई विभाग के अधिकारी और कर्मचारी शामिल थे। बाद में चालक और मुक्त हुए यात्री वाल्मीकिनगर थाना पहुंचे और घटना की जानकारी पुलिस को दी। चालक के बयान पर वाल्मीकिनगर थाना में कांड संख्या 31/2002 दर्ज किया गया, जिसमें रामचन्द्र चौधरी, योगेन्द्र चौधरी उर्फ योगी मल्लाह समेत आठ-नौ अज्ञात अपराधियों को आरोपित बनाया गया था।

पुलिस जांच के बाद वर्ष 2007 में आरोप पत्र न्यायालय में समर्पित किया गया। जिसमें नामजद आरोपितों के साथ कुछ अप्राथमिकी अभियुक्तों को भी शामिल किया गया। इसके बाद न्यायालय में मामले की सुनवाई शुरू हुई, लेकिन लंबे समय तक चले ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ठोस गवाह और प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका।अंततः साक्ष्य के अभाव में अदालत ने योगेन्द्र मल्लाह को बरी कर दिया।
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