सांकेतिक तस्वीर।
सुमन सेमवाल, देहरादून। अर्बन कोओपरेटिव बैंक लिमिटेड, देहरादून पर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) की ओर से कड़े प्रतिबंध लगाने के बाद बड़ा घपला सामने आ रहा है।
इसकी कहानी भी यस बैंक की राह पर आगे बढ़ती रही। कर्ज बांटने में किए गए घोटालों से बैंक घाटे के दलदल में फंसता रहा, लेकिन प्रबंधन फायदा दिखाता रहा।
बैंक के नान परफार्मिंग एसेट (एनपीए) ऋण की राशि करीब 38 करोड़ रुपये बताई जा रही है, जबकि बैंक में करीब नौ हजार खाताधारकों के 124 करोड़ रुपये से अधिक जमा हैं, जिनकी वापसी को लेकर आशंका गहरा गई है।
आरबीआइ ने न सिर्फ बैंक पर छह माह का प्रतिबंध लगाया है, बल्कि खाताधारकों के रकम निकालने पर भी रोक लगा दी है।
आरबीआइ ने अर्बन कोओपरेटिव बैंक, देहरादून पर कार्रवाई भले अब की है, लेकिन गड़बड़ी की शुरुआत वर्ष 2013-14 में हो गई थी।
तब प्रबंधन ने चहेते व्यक्तियों को मशीनरी की खरीद और अन्य नाम पर ऋण की बंदरबांट कर दी। ऋण फंसते चले गए और बैंक ने इस ओर ध्यान नहीं दिया।
यहां तक कि बैंक के घाटे में आने की स्थिति पर भी फायदा दिखाया जाता रहा। प्रभावित खाताधारकों में नगर निगम और लोक निर्माण विभाग के कई ठेकेदार भी शामिल हैं।
प्रबंधन प्रोविजनिंग करता तो समय रहते पकड़ में आता मामला
प्रत्येक बैंक को बांटे गए ऋण और फंसी स्थिति वाले ऋण के लिए अलग-अलग प्रतिशत में प्रोविजनिंग (ऋण हानि प्रविधान) करनी होती है।
अर्बन बैंक के प्रबंधन ने ऐसा करने के बजाय फंसे कर्ज पर पर्दा डाल दिया। यदि नियमों के अनुसार समय-समय पर ऐसा किया जाता तो आज हालात इतने विकट न होते। पूर्व में इसी तरह की गड़बड़ी यस बैंक और बैंक आफ महाराष्ट्र में सामने आई थी।
आरबीआइ की भूमिका पर भी उठाए सवाल
खाताधारकों ने अर्बन कोओपरेटिव बैंक में की गई वित्तीय अनियमितता के मामले में आरबीआइ की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं।
बैंक में चार करोड़ की जमा राशि वाले खाताधारक अचिन गुप्ता ने कहा कि आरबीआइ प्रत्येक वर्ष बैंक का आडिट किया, लेकिन फिर भी गड़बड़ी की तरफ ध्यान नहीं दिया।
उन्होंने कहा कि यदि सक्षम अधिकारी गड़बड़ी पकड़ लेते तो आज नौ हजार खाताधारकों के समक्ष संकट खड़ा न होता।
एक ही परिवार के व्यक्तियों का बैंक पर रहा कब्जा
खाताधारकों ने आरोप लगाया कि अर्बन कोओपरेटिव बैंक की दुर्गति के पीछे पूरी तरह प्रबंधन के कुछ व्यक्ति जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा कि बैंक पर एक ही परिवार का कब्जा रहा।
पहले बैंक के चेयरमैन रमेश ममगाईं थे और फिर उन्होंने अपने बेटे मयंक ममगाईं को कुर्सी सौंप दी। आरोप है कि ममगाईं परिवार ने ऋण बांटने में नियमों का पालन नहीं किया और धीरे-धीरे कर बैंक खोखला होता चला गया। |
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