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मंडी शिवरात्रि: छोटी काशी में जब उमड़ते हैं सैकड़ों देवी-देवता तो घुंघट ओढ़े राजमहल में ही विराजती हैं नरोल देवियां

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मंडी शिवरात्रि महोत्सव के दौरान राजमहल में विराजमान नरोल देवियां।  



जागरण संवाददाता, मंडी। अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव में जहां एक ओर सैकड़ों देवी-देवता जलेब और पड्डल मैदान में होने वाले भव्य देव समागम में शामिल होकर आस्था का विराट दृश्य प्रस्तुत करते हैं। वहीं छह विशिष्ट देवियां ऐसी भी हैं, जो पूरे मेले के दौरान राजमहल की मर्यादा में ही विराजती हैं। इन्हें नरोल देवियां कहा जाता है।

इनमें बगलामुखी, देवी बूढ़ी भैरवा पंडोह, देवी काश्मीरी माता कुकलाह, धूमावती माता पंडोह, देवी बुशाई माता राजमाता कैहनवाल और रूपेश्वरी राजमाता शामिल हैं। ये सभी देवियां न तो जलेब में शिरकत करती हैं और न ही पड्डल मैदान में देव समागम का हिस्सा बनती हैं।

शिवरात्रि मेले के पहले दिन से लेकर समापन तक यह राजमहल स्थित रानियों के निवास स्थान ‘रूपेश्वरी बेहड़ा’ में घुंघट ओढ़कर वास करती हैं।
क्या है लोक मान्यता

लोकमान्यता है कि प्राचीन समय में ये देवियां रानियों की सखियां थीं। जब समस्त प्रजा और राजपरिवार मेले में भाग लेने निकलता था, तब ये सखियां रानी के साथ महल में ही रहती थीं। तभी से इन्हें ‘नरोल’ अर्थात महल की देवियां कहा जाने लगा।
बूढ़ा बिगल भी राजमहल में रहते हैं विराजमान

नरोल देवियों के साथ देव बूढ़ा बिगल भी पूरे महोत्सव के दौरान राजमहल में ही विराजमान रहते हैं। देव बूढ़ा बिगल अपने बजीर झाथी वीर के बिना कहीं नहीं जाते। देवता से संवाद भी बजीर झाथी वीर के रथ के माध्यम से ही किया जाता है। देव बूढ़ा बिगल के मोहरे करंडी में विराजमान रहते हैं, जो उनकी अलग पहचान है।

मंडी शहर से सटे रूंझ गांव में देव बूढ़ा बिगल का प्राचीन मंदिर स्थित है। मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण महाभारत काल में पांडवों ने किया था।

आस्था, इतिहास और राजपरंपरा का यह अद्भुत संगम आज भी शिवरात्रि महोत्सव में नरोल देवियों की विशिष्ट परंपरा के रूप में जीवित है, जो मंडी की सांस्कृतिक विरासत को अलग पहचान देता है।
राजा ने दिया था विशेष स्थान

राजाओं के दौर में जब रानियां राजमहल में शिवरात्रि महोत्सव के दौरान अकेली अंदर होती थीं, तो ये देवियां उनकी सहेलियों की तरह उनसे बात करती थीं। एक बार देवी के प्रसाद में राजा को बाल आ गया था, जिससे राजा नाराज हो गए और उन्होंने क्रोधित होकर देवियों का अपमान कर दिया।

कुछ समय बाद ही मंडी के राजा किसी अन्य रियासत के राजा की कैद में चले गए, तब उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने देवियों से माफी मांगी। राजपरिवार ने देवियों का मनन पूजन किया। इसके बाद देवियों को राज महल में विशेष स्थान दिया गया।
देवियां निभा रही सदियों की परंपरा

कहा जाता है कि राजा की रानियां रियासतों के दौर में घुंघट में रहा करती थीं, उनकी सहेलियों की तरह यह देवियां अभी भी सदियों की परंपरा को निभा रही हैं। राजा और रजवाड़ों के दौर खत्म हो गए, लेकिन देवियां शिवरात्रि महोत्सव में हर साल मंडी के राज महल में पहुंचती हैं और यहां पर 7 दिन तक वास करती हैं।

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