Indian Army AI interceptor drones: आजकल के युद्धों में ड्रोन सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरे हैं. चाहे यूक्रेन हो या मध्य पूर्व, छोटे-छोटे ड्रोन बड़े जहाजों और टैंकों को तबाह कर रहे हैं. इसी खतरे को देखते हुए भारत ने अब 'लोहे को लोहे से काटने' की रणनीति अपनाई है. भारतीय सेना अब ऐसे ड्रोन तैयार कर रही है जिनका काम ही दूसरे ड्रोनों को मार गिराना होगा. इन ड्रोनों को इंटरसेप्टर ड्रोन कहा जाता है. इन ड्रोनों की सबसे बड़ी खासियत इनकी मल्टी-टास्किंग है. ये दुश्मन के ड्रोन को पकड़ने के लिए केवलर (Kevlar) के जाल का इस्तेमाल करेंगे, और अगर जरूरत पड़ी, तो ये खुद उससे टकराकर उसे नष्ट कर देंगे. इसमें AI तकनीक का इस्तेमाल होने से ये दुश्मन की रफ्तार और मुड़ने के तरीके को समझकर खुद अपनी दिशा बदल सकेंगे. ऐसे में, ये ड्रोन न केवल सीमा पर तैनात होंगे, बल्कि महत्वपूर्ण सरकारी इमारतों और वीआईपी इलाकों की सुरक्षा के लिए भी तैनात किए जा सकते हैं.
कैसे काम करेंगे ये शिकारी ड्रोन?
भारत के इन इंटरसेप्टर ड्रोनों के पास दुश्मन को खत्म करने के तीन मुख्य तरीके होंगे.
1. जाल बिछाकर पकड़ना (Soft Kill)- ये ड्रोन अपने साथ केवलार (Kevlar) से बने बहुत मजबूत जाल लेकर उड़ेंगे. जब ये दुश्मन के ड्रोन के पास पहुंचेंगे, तो हवा में ही उस पर जाल फेंक देंगे. यह जाल दुश्मन के पंखों में फंस जाएगा और वह ड्रोन जमीन पर गिर जाएगा. यह तरीका उन इलाकों के लिए सबसे अच्छा है जहां भीड़-भाड़ हो, क्योंकि इसमें कोई धमाका नहीं होता और मलबा सुरक्षित तरीके से गिरता है.

2. खुद टकरा जाना (Ramming - Hard Kill)- अगर दुश्मन का ड्रोन बहुत तेज है या जाल से नहीं पकड़ा जा रहा, तो हमारा इंटरसेप्टर ड्रोन सीधे उससे जा टकराएगा. यह एक 'आत्मघाती' तरीका है जहां दुश्मन को नष्ट करने के लिए भारत अपना ड्रोन कुर्बान कर देगा. यह उन कीमती लक्ष्यों जैसे तेल डिपो या सेना के कैंप को बचाने के लिए जरूरी है जहां दुश्मन के ड्रोन को किसी भी कीमत पर रोकना होता है.
3. छर्रों से हमला (Shrapnel Spray)- एक और विकल्प यह है कि ड्रोन के पास पहुंचकर यह छोटे-छोटे लोहे के टुकड़े या छर्रे बिखेर देगा. ये छर्रे दुश्मन के ड्रोन के सेंसर या पंखों को तोड़ देंगे, जिससे उसका कंट्रोल खत्म हो जाएगा.
AI और इंसान का अनोखा तालमेल
ये ड्रोन केवल मशीन नहीं, बल्कि 'दिमाग' वाले लड़ाके होंगे. ड्रोन में लगा AI खुद ही दुश्मन की पहचान करेगा, उसका पीछा करेगा और यह तय करेगा कि हमला कब करना है. इससे रिएक्शन टाइम बहुत कम हो जाता है. भले ही ड्रोन खुद उड़ रहा हो, लेकिन हमला करने की अंतिम मंजूरी जमीन पर बैठा एक सैनिक देगा. इसे 'मैन-इन-द-लूप' कहा जाता है, ताकि गलती से किसी पक्षी या अपने ही ड्रोन पर हमला न हो जाए.
भविष्य के युद्ध के लिए जरूरी
जंग के मैदान में दुश्मन के 10-20 लाख के ड्रोन को गिराने के लिए करोड़ों की मिसाइल दागना नुकसान का सौदा है. ये इंटरसेप्टर ड्रोन बहुत सस्ते होंगे और इनका इस्तेमाल करना आसान होगा. इतना ही नहीं, ये ड्रोन घंटों तक हवा में रहकर सरहद की निगरानी कर सकते हैं और जैसे ही कोई संदिग्ध हरकत दिखे, तुरंत कार्रवाई कर सकते हैं. साथ ही, भविष्य में दुश्मन सैकड़ों ड्रोन एक साथ भेज सकता है. ऐसे में हमारे इंटरसेप्टर ड्रोनों की फौज ही उनका सही मुकाबला कर पाएगी.
बदलते खतरों का सटीक तोड़
दुश्मन अब 'लोइटरिंग म्युनिशन्स' यानी ऐसे ड्रोनों का इस्तेमाल कर रहे हैं जो घंटों हवा में चक्कर काटते हैं और मौका मिलते ही हमला करते हैं. भारत के इंटरसेप्टर ड्रोन इसी ऊंचाई और रफ्तार पर काम करेंगे जहां ये खतरे मौजूद होते हैं. ये ड्रोन जमीन से कुछ सौ मीटर की ऊंचाई पर उड़ने वाले खतरों को रोकने के लिए डिजाइन किए गए हैं. वहीं, इन्हें आसानी से गाड़ियों में रखकर कहीं भी ले जाया जा सकता है और तुरंत लॉन्च किया जा सकता है.
परतों वाली सुरक्षा
भारत अब अपनी सुरक्षा को 'मल्टी-लेयर' बना रहा है. पहला लेयर रडार और इलेक्ट्रॉनिक जैमर्स जो ड्रोन का सिग्नल काट दें. दूसरा लेयर ये नए इंटरसेप्टर ड्रोन जो भाग रहे ड्रोन को पकड़ लें. वहीं, तीसरा लेयर जमीन से मार करने वाली बंदूकें और मिसाइलें होंगी.
ऐसे में, जब ये 'शिकारी ड्रोन' भारतीय सेना के बेड़े में शामिल होंगे, तो हमारे आसमान में घुसपैठ करना दुश्मन के लिए नामुमकिन हो जाएगा. यह तकनीक न केवल युद्ध के मैदान में जीत दिलाएगी, बल्कि शांति के समय में भी हमारे महत्वपूर्ण संस्थानों की ढाल बनेगी.
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