ओडिशा में हाथी-मानव संघर्ष बना राष्ट्रीय चिंता का विषय
संतोष कुमार पांडेय, अनुगुल। ओडिशा में हाथी-मानव संघर्ष लगातार भयावह रूप लेता जा रहा है। वन विभाग के हालिया आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2024-25 में राज्य में हाथियों के हमलों में 171 लोगों की मौत दर्ज की गई। यह संख्या देश में सर्वाधिक है और बीते वर्षों की तुलना में भी अधिक है।
आंकड़ों के अनुसार 2019-20 से 2023-24 के बीच राज्य में 624 से अधिक लोगों की जान हाथी हमलों में गई। पिछले एक दशक में यह संख्या करीब 900 के पार पहुंच चुकी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ओडिशा में हाथियों की अनुमानित आबादी लगभग 2,000 के आसपास है, फिर भी प्रति 100 हाथियों पर मानव मौतों का अनुपात अन्य राज्यों की तुलना में अधिक है।
हाथियों की भी बड़ी क्षति
मानव-हाथी संघर्ष का असर केवल लोगों पर ही नहीं, बल्कि हाथियों पर भी पड़ा है। वर्ष 2024-25 में राज्य में 106 हाथियों की मौत दर्ज की गई, जो पिछले दस वर्षों में सर्वाधिक मानी जा रही है। बीते एक दशक में विभिन्न कारणों—बिजली करंट, ट्रेन दुर्घटना, शिकार, बीमारी और प्राकृतिक कारणों—से 800 से अधिक हाथियों की जान गई है।
क्यों बढ़ रहा है टकराव?
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार हाथियों के पारंपरिक कॉरिडोर बाधित होने से समस्या गंभीर हुई है। खनन परियोजनाएं, औद्योगिक विस्तार, स्टोन क्रशर इकाइयां और कृषि क्षेत्र का फैलाव हाथियों के प्राकृतिक मार्गों को तोड़ रहे हैं। जंगल सिमटने से हाथी भोजन और पानी की तलाश में गांवों की ओर रुख कर रहे हैं।
मुआवजा बढ़ा, पर समाधान अधूरा
राज्य सरकार ने हाथी हमलों में मृतकों के परिजनों के लिए मुआवजा राशि बढ़ाकर 10 लाख रुपये कर दी है। फसल क्षति और घायल लोगों के लिए भी आर्थिक सहायता दी जा रही है। इसके बावजूद ग्रामीण इलाकों में भय का माहौल बना हुआ है।
दीर्घकालिक रणनीति की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल मुआवजा पर्याप्त नहीं है। हाथी कॉरिडोर की वैज्ञानिक पहचान, अवैध अतिक्रमण पर रोक, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और स्थानीय समुदाय की भागीदारी के बिना इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
ओडिशा में बढ़ती मानव-हाथी मुठभेड़ न केवल वन्यजीव संरक्षण, बल्कि ग्रामीण सुरक्षा और विकास मॉडल पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है। समय रहते समन्वित और ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह संकट और गहरा सकता है। |
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