मेले में शिल्प गुरु मोहम्मद मतलूब के स्टॉल पर कृतियों की खरीदारी करते हुए लोग। जागरण
अनिल बेताब, फरीदाबाद। सूरजकुंड इंटरनेशनल आत्मनिर्भर क्राफ्ट मेले में कई ऐसे कारीगर आए हैं जिन्होंने अपनी कारीगरी से दुनिया भर में अपनी पहचान बनाई है। कुछ कारीगर नई पीढ़ी को पारंपरिक कारीगरी से जोड़कर उनका भविष्य बनाने में लगे हैं, तो कुछ आबादी की प्लानिंग में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। इनमें नगीना, बिजनौर (UP) के क्राफ्ट गुरु मोहम्मद मतलूब का नाम खास तौर पर उल्लेखनीय है।
वह अपने बेटे मोहम्मद मरगूब के साथ मिलकर अलग-अलग शहरों के युवाओं को मुगलकालीन कारीगरी से जोड़ रहे हैं। क्राफ्ट गुरु मोहम्मद मतलूब अपनी पत्नी शाहीन अंजुम और बेटे मोहम्मद मरगूब के साथ सूरजकुंड मेले में आए थे। मोहम्मद मतलूब अपनी बारीक और पारंपरिक नक्काशी के लिए खास तौर पर जाने जाते हैं।
सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प मेला में खरीदारी करते हुए महिलाएं। जागरण
उनकी नक्काशी में मुगलकालीन आर्किटेक्चर की झलक दिखती है। वह जालीदार काम और बारीक डिजाइन में माहिर हैं। इसी वजह से उन्हें पहले दिल्ली सरकार ने सम्मानित किया और बाद में दूसरे अवॉर्ड भी मिले। वह अपनी नक्काशी के लिए मुख्य रूप से शीशम, चंदन और आबनूस जैसी लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं।
वे मेले में मुगलकालीन जालीदार पार्टीशन लाए हैं, जिसकी कीमत दो लाख रुपये से ज़्यादा है। इसे बनाने में उन्हें तीन महीने लगे। उनके पास ज्वेलरी बॉक्स, पेंसिल बॉक्स, बोर्ड, गुल्लक, मोबाइल स्टैंड, वॉकिंग स्टिक, कुर्सियां, ब्रेसलेट और क्लिप भी हैं। उनका स्टॉल नंबर 1234 है। खास बात यह है कि उनके पिता क्राफ्ट गुरु हैं और बेटा स्टेट अवार्डी है।
नए संसद भवन की शिल्प दीर्घा गैलरी के लिए नक्काशी
क्राफ्ट गुरु मोहम्मद मतलूब ने नए संसद भवन की शिल्प दीर्घा गैलरी के लिए नक्काशी की है। कई नेशनल और इंटरनेशनल अवॉर्ड जीत चुके क्राफ्ट गुरु मोहम्मद मतलूब समय-समय पर IIT में होने वाली वर्कशॉप में स्टूडेंट्स को इस स्किल की ट्रेनिंग देते हैं, ताकि नई पीढ़ी इस कला को सीख सके और इसमें माहिर हो सके। उन्होंने स्टूडेंट्स को इस कला की बारीकियां सिखाने के लिए गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी, कानपुर, रुड़की, दिल्ली और मुंबई का भी दौरा किया है। गेस्ट इंस्ट्रक्टर के तौर पर, वे ट्रेनिंग देने के लिए कई इंस्टीट्यूशन में जाते हैं।
मुगल आर्ट से बचपन का कनेक्शन
मोहम्मद मतलूब ने बचपन में अपने चाचा से मुगल आर्ट की बारीकियां सीखना शुरू किया। फिर वे 1980 में फैमिली वजहों से दिल्ली आ गए। मतलूब ने बताया कि यहां आने के बाद, उन्होंने लकड़ी पर मुगल आर्ट पीस बनाना शुरू किया। अलग-अलग शहरों में मेलों, एग्जीबिशन और आर्ट गैलरी में उनके काम की डिमांड बढ़ गई। उन्हें मिनिस्ट्री ऑफ़ टेक्सटाइल्स के ज़रिए कई जगहों पर जाने का मौका भी मिला। भगवान की कृपा से उनकी कला की तारीफ़ हुई और अवॉर्ड मिलने लगे।
उनकी उपलब्धियों पर एक नजर
- 2002, दिल्ली स्टेट अवॉर्ड
- 2005, उस समय की प्रेसिडेंट प्रतिभा पाटिल से नेशनल अवॉर्ड
- 2006, UNESCO एक्सीलेंस अवॉर्ड
- 2016, शिल्प गुरु अवॉर्ड
- 2018, वर्ल्ड क्राफ्ट काउंसिल से कुवैत में सम्मानित
- 2021, बेटे मोहम्मद मरगूब को स्टेट अवॉर्ड मिला
क्राफ्ट्स मास्टर तक कैसे पहुंचें
फरीदाबाद के गेट दो और तीन से उनके स्टॉल नंबर 1234 तक आसानी से पहुँचा जा सकता है। दिल्ली से आने वाले टूरिस्ट VIP गेट या फ़ूड कोर्ट से होकर भी मोहम्मद मतलूब के स्टॉल तक पहुँच सकते हैं।
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