हिमाचल में 31 मई से पहले कराने होंगे निकाय चुनाव (फाइल फोटो)
राज्य ब्यूरो, शिमला। सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश में स्थानीय निकाय चुनावों की समय सीमा 30 अप्रैल से बढ़ाकर 31 मई कर दी है। शीर्ष अदालत ने परिसीमन और आरक्षण संबंधी प्रक्रिया पूरी करने के लिए भी 28 फरवरी की समय सीमा को 31 मार्च तक बढ़ाया।
कोर्ट ने मानसूनी कठिनाइयों और पुनर्निर्माण कार्यों को ध्यान में रखते हुए यह राहत दी, लेकिन स्पष्ट किया कि अब कोई और विस्तार नहीं मिलेगा।
शुक्रवार को प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने प्रधान सचिव द्वारा दायर याचिका पर संज्ञान लेते हुए पुनर्निर्माण कार्य, परिसीमन और आरक्षण को पूरा करने के लिए हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित 28 फरवरी की समय सीमा को बढ़ाकर 31 मार्च कर दिया। हाईकोर्ट के आदेश में संशोधन करते हुए शीर्ष न्यायालय ने वर्षा प्रभावित राज्य में परिसीमन और अन्य पुनर्निर्माण कार्यों में सरकार और राज्य चुनाव आयोग को हो रही कठिनाइयों पर भी ध्यान दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने समय सीमा एक महीने बढ़ाते हुए कहा कि हाईकोर्ट का निर्णय सही था कि परिसीमन कार्य के लंबित होने को स्थानीय निकाय चुनाव में विलंब और रुकावट का आधार नहीं बनाया जा सकता। पीठ ने कहा कि मानसून और उससे उत्पन्न राज्य की सामान्य कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए चुनाव प्रक्रिया 31 मई से पहले संपन्न होनी चाहिए। प्रधान न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि समय बढ़ाने के लिए कोई भी नया आवेदन स्वीकार नहीं किया जाएगा।
याचिकाकर्ता डिक्कन कुमार के अधिवक्ता नंद लाल ठाकुर ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप नहीं करेगा। स्थानीय निकाय चुनाव को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। सरकार की मांग के आधार पर एक माह का समय दिया जाता है।
इससे पहले, हाई कोर्ट ने 30 अप्रैल तक राज्य में चुनाव कराने के निर्देश दिए थे, जिसे राज्य सरकार ने चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन दायर की थी। प्रदेश सरकार ने चुनाव प्रक्रिया के लिए कम समय देने व आपदा प्रबंधन अधिनियम लागू होने को आधार बनाया था।
किस आधार पर दी राहत
सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार की इस दलील को स्वीकार किया है कि पुनर्गठन, मतदाता सूची और आपत्तियों तथा जनगणना न होने के कारण ओबीसी आरक्षण को समय लगेगा। न्यायालय ने यह भी कहा कि बीच में समय सीमा बढ़ाने के आवेदन को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
अब शीघ्र जारी करना होगा आरक्षण रोस्टर
अब राज्य सरकार को आरक्षण रोस्टर को शीघ्र जारी करना होगा। प्रदेश में लगभग 3577 पंचायतें, 92 पंचायत समितियां, 12 जिला परिषद और शिमला नगर निगम को छोड़कर 73 शहरी निकायों में चुनाव प्रस्तावित हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राज्य चुनाव आयोग चुनाव कार्यक्रम की घोषणा करेगा। प्रशासनिक स्तर पर मतदाता सूचियों के अंतिम प्रकाशन और चुनावी तैयारियों को भी गति मिलेगी।
क्यों हुआ विवाद?
प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर परिसीमन आदि की प्रक्रिया मई में शुरू की गई थी। इसके बाद राज्य निर्वाचन आयोग ने अगस्त से आरक्षण रोस्टर जारी करने और मतदाता सूचियों को तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की। इस बीच, आठ अक्टूबर को आपदा प्रबंधन अधिनियम लागू किया गया, जिसके बाद जिला उपायुक्तों ने न तो आरक्षण रोस्टर जारी किया और न ही मतदाता सूचियों को अधिसूचित किया। समय पर चुनाव करवाने को लेकर मामला प्रदेश उच्च न्यायालय में पहुंच गया।
क्या है मामला?
हिमाचल में 3577 में से 55 पंचायतों ( केलंग की 32, पांगी 19 और कुल्लू की चार) को छोड़ शेष का कार्यकाल 31 जनवरी को समाप्त हो गया। संविधान के अनुसार चुनाव करवाने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग ने प्रक्रिया मई से शुरू कर दी। आठ अक्टूबर, 2025 को सरकार ने आपदा प्रबंधन अधिनियम लागू कर इसके हटने के बाद ही चुनाव की बात कही। चार नवंबर को अधिवक्ता डिक्कन कुमार ठाकुर व अन्य ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनाव जानबूझकर देरी से करवाने का तर्क दिया।
14 नवंबर को चुनाव आयोग ने मतदाता सूची जारी करने को कहा। 17 नवंबर को आयोग ने आदर्श आचार संहिता की धारा 12.1 लागू कर पंचायतों के पुनर्गठन पर रोक लगा दी। सरकार ने 24 नवंबर को पंचायतों के पुनर्गठन को मंजूरी दी। चुनाव टालने पर जनहित याचिका पर 22 दिसंबर को मामले की पहली सुनवाई कोर्ट में हुई। हाईकोर्ट ने सरकार व राज्य निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा।
सात जनवरी को अदालत ने सभी पक्षों को सुना। नौ जनवरी को निर्णय सुनाया कि 28 फरवरी तक स्थानीय निकायों का पुनर्गठन व आरक्षण रोस्टर जारी करें और 30 अप्रैल से पहले चुनाव करवाएं। निर्णय को चुनौती देते हुए प्रदेश सरकार ने तीन फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) दायर की। |