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बॉम्बे हाई कोर्ट ने सुनाया फैसला, कमर्शियल कोऑपरेटिव सोसाइटी को मिलेगा डीम्ड कन्वेयंस, बिल्डर को लगा झटका

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बॉम्बे हाई कोर्ट ने सुनाया फैसला (फोटो-पीटीआई)



डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। बॉम्बे हाई कोर्ट ने बुधवार, 11 फरवरी को अंधेरी ईस्ट में एक कमर्शियल कोऑपरेटिव सोसाइटी को डिप्टी रजिस्ट्रार के दिए गए डीम्ड कन्वेयंस को सही ठहराया।\“
क्या है डीम्ड कन्वेयंस?

डीम्ड कन्वेयंस एक कानूनी प्रोसेस है जिसमें जमीन और बिल्डिंग का मालिकाना हक एक काबिल अथॉरिटी द्वारा हाउसिंग सोसाइटी को ट्रांसफर कर दिया जाता है।

ऐसा तब होता है, जब अक्सर प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद सहयोग न करने या देरी के कारण असली बिल्डर या मालिक काम को पूरा करने से मना कर देता है।
बिल्डर को लगा झटका

हाई कोर्ट ने कहा, \“पब्लिक इंटरेस्ट में बनाए गए कानून को बिल्डर और फ्लैट खरीदारों के बीच कॉन्ट्रैक्ट से ओवरराइड नहीं किया जा सकता, जो बिल्डर के लिए जमीन पर आगे डेवलपमेंट का अधिकार रिजर्व रखता है।

कृष्णा डेवलपर्स ने कॉर्पोरेट सेंटर प्रेमिसेस को-ऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड को दिए गए डीम्ड कन्वेयंस का विरोध किया। यह सोसाइटी 2007 में रजिस्टर हुई थी, जो तीन बिल्डिंग के यूनिट खरीदारों को रिप्रेजेंट करती है।

बिल्डर के वकील ने तर्क दिया कि वह फ्लैट खरीदारों के साथ किए गए एग्रीमेंट के तहत रिजर्व अधिकारों के अधीन, कन्वेयंस करने को तैयार था। लेकिन हाई कोर्ट ने कहा, \“पार्टियां एग्रीमेंट से लेजिस्लेटिव ऑर्डर को ओवरराइड नहीं कर सकतीं।\“

जस्टिस अमित बोरकर की सिंगल-जज की बेंच ने अपने ऑर्डर में कहा, \“2024 में फाइल की गई एक पिटीशन में कृष्णा डेवलपर्स की शिकायत असल में यह थी कि सोसाइटी को दिया गया कन्वेयंस उनके फायदे के लिए नहीं था।\“
कानूनी दायरे में कन्वेयंस देना जरूरी

हाई कोर्ट ने कहा कि ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) जारी होने के बाद तीनों बिल्डिंग्स को कन्वेयंस दिया गया था और मंजूर प्लान के हिसाब से सभी मंजूर FSI का इस्तेमाल किया गया था।

सोसाइटी के वकील अरुण पणिक्कर ने दलील दी कि हालांकि बिल्डर ने कन्वेयंस करने की इच्छा जताई थी, लेकिन असल में, कानूनी समय के अंदर कन्वेयंस पूरा करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया, जिससे डीम्ड कन्वेयंस के लिए कार्रवाई की जरूरत पड़ी। बिल्डिंग के निर्माण के पूरा होने के बाद सोसाइटी को कन्वेयंस देना कानून के हिसाब से पब्लिक इंटरेस्ट में जरूरी है।

हाई कोर्ट ने जोर देकर कहा, \“महाराष्ट्र ओनरशिप फ्लैट्स एक्ट (MOFA) का सेक्शन 11 अथॉरिटी को यह खास ड्यूटी देता है कि अगर प्रमोटर तय समय के अंदर कन्वेयंस पूरा करने में फेल हो जाए तो वह दखल दे।\“

कोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि तीनों बिल्डिंग्स का काम पूरा होने के बाद प्रमोटर के पास कोई डेवलपमेंट राइट्स नहीं बचे थे।

हाई कोर्ट ने कहा, \“एक बार जब उपलब्ध FSI खत्म हो गया और ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट जारी हो गए, तो प्रमोटर की कानूनी ड्यूटी पूरी हो गई, जो सिर्फ मंजूर प्लान में कानूनी तौर पर दर्ज है।\“

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