
अमेरिका के साथ अचानक हुए व्यापार करार पर राहुल गांधी ने कहा है, “मोदी जी पर भयंकर दबाव है। उनकी छवि का जो गुब्बारा है, जिसे हजारों करोड़ रुपए खर्च कर बनाया गया था, वो फूट सकता है। असल में समस्या (पूर्व सेना प्रमुख एमएम) नरवणे जी का बयान नहीं है, ये तो ‘साइड शो’ है। बड़ी बात यह है कि भारत के प्रधानमंत्री ‘कंप्रोमाइज्ड’ हो चुके हैं।” दूसरी ओर, इस करार के लिए नरेन्द्र मोदी का सम्मान किया गया। फोटो के साथ यह खबर दि एशियन एज में लीड है, इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर है। द टेलीग्राफ में फोटो के साथ खबर सेकेंड लीड है। हिन्दुस्तान टाइम्स में फोटो है लेकिन खबर नहीं है। खबर के अनुसार, महीनों की बातचीत के बाद अमेरिका के साथ ट्रेड डील की घोषणा के एक दिन बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन या राजग) सांसदों से कहा कि भारत वैश्विक मंच पर केंद्र में है जो नई व्यवस्था को आकार दे रहा है और “दुनिया भारत की ओर झुक रही है”। वहां मौजूद एक सांसद के अनुसार, राजग संसदीय दल की बैठक में मोदी ने ईयू के साथ समझौते के कुछ दिनों बाद अमेरिका के साथ भारत की ट्रेड डील का ज़िक्र किया और इसे “एक बड़ा फैसला बताया जिससे देश में बड़ी संख्या में लोगों को फायदा होगा”। दूसरी ओर, राहुल गांधी ने अपने बयान में कहा है और आज यह अखबारों में पहले पन्ने पर तो नहीं ही है। सरकारी खबरों पर विपक्ष की प्रतिक्रिया के रूप में भी नजर नहीं आया। राहुल गांधी ने कहा है और आप जानते हैं कि पिछले चार महीनों से रुकी हुई ट्रेड डील अचानक हो गई। तब जब राहुल गांधी ने चीन के साथ सीमा विवाद पर मनोज मुकुंद नरवणे की किताब का अंश पढ़ना चाहा। राहुल गांधी ने कहा कि करार में कोई बदलाव नहीं हुआ है। सोमवार की रात अचानक इसपर दस्तखत हो गए। राहुल गांधी ने सवाल किया है कि इसके पीछे क्या वजह है? द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार इस करार के लिए अमेरिका में ट्रम्प की तारीफ की तारीफ हुई है।
आपको याद दिला दूं कि, अगस्त 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के साथ व्यापार समझौतों को लेकर स्पष्ट कहा था कि वे किसानों, पशुपालकों और मत्स्यपालकों के हितों से कभी भी समझौता नहीं करेंगे, भले ही इससे अमेरिका के साथ व्यापारिक सौदे मुश्किल हों या टकराव की स्थिति बने। ऐसा रुख रखने में उन्हें “व्यक्तिगत रूप से भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है लेकिन वे इसके लिए तैयार हैं।” अब इसे राहुल गांधी के आरोप से जोड़कर देखिए। राहुल गांधी ने कहा है कि अदाणी के खिलाफ अमेरिका का केस असल में मोदी के खिलाफ है। आप जानते हैं कि भारत सरकार ने कई महीने तक अमेरिकी नोटिस को अदाणी को सर्व नहीं होने दिया और एपस्टीन फाइल में मोदी और उनके सहयोगियों के नाम आए हैं। इसलिए ट्रम्प के दबाव में करार का मतलब है और व्यक्तिगत रूप से भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है को जल्दबाजी में शर्तों का खुलासा किए बगैर किए गए समझौते और ऐसे समझौते के लिए सम्मान से जोड़कर देखिए तो लगता है कि ‘कंप्रोमाइज्ड हो चुके हैं’ जैसे राहुल गांधी के आरोप में दम है। उधर, एपस्टीन फाइल में ट्रम्प के नाम और मजबूरी की कहानी अलग है।
जो भी हो, आज देशबन्धु ने लिखा है – अमेरिका-भारत ट्रेड डील पर पीयूष गोयल ने कहा कि किसानों, मछुआरों के हितों से समझौता नहीं किया गया है। जाहिर है, प्रधानमंत्री ने अगस्त में कहा था कि वे ऐसा समझौता नहीं करेंगे और “व्यक्तिगत रूप से भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है लेकिन वे इसके लिए तैयार हैं” तो पीयूष गोयल के लिए बचाव करना जरूरी है। खासकर तब जब राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री दबाव में हैं। देशबन्धु में पीयूष गोयल की इस खबर के साथ दो कॉलम में शीर्षक और सात लाइन में छपी खबर है, राजग सांसदों ने मोदी का अभिनंदन किया। आज मेरे नौ अखबारों में देशबन्धु अकेला है जिसने अमेरिका के साथ व्यापार करार की खबर को लीड नहीं बनाया है। बाकी के आठ अखबारों में से चार की लीड यही है कि किसानों, कृषि-डेरी और संवेदनशील क्षेत्रों को करार में शामिल नहीं किया गया है। अमर उजाला ने शीर्षक से सरकारी प्रचार पूरा किया है। शीर्षक है, कृषि व डेरी क्षेत्र के हितों से कोई समझौता नहीं सरकार ने कहा – हमारे लिए किसान हित सर्वोपरि। आप जानते हैं कि किसानों की आय दूनी की जानी थी, फिर भी सरकार ने तीन कृषि कानून किसानों की सलाह के बिना घोषित कर दिया। भारी विरोध हुआ जो एक साल से ज्यादा चला। अंततः सरकार को कानून वापस लेना पड़ा। तब प्रधानमंत्री ने कहा था, पीएम मोदी ने उत्तर प्रदेश और पंजाब में विधानसभा चुनाव से पहले तीनों क़ानूनों के वापस लेने की घोषणा की थी। तीन विवादित कृषि क़ानूनों का ज़िक्र करते हुए कहा, ”हम अपने प्रयासों के बावजूद कुछ किसानों को समझा नहीं पाए। कृषि अर्थशास्त्रियों ने, वैज्ञानिकों ने, प्रगतिशील किसानों ने भी उन्हें कृषि क़ानूनों के महत्व को समझाने का भरपूर प्रयास किया। किसानों की स्थिति को सुधारने के इसी महाअभियान में देश में तीन कृषि क़ानून लाए गए थे।” 19 नवंबर 2021 को, गुरु पर्व के अवसर पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में तीनों विवादित कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की। इस दौरान उन्होंने कहा, “मैं आज देशवासियों से क्षमा मांगते हुए सच्चे मन से कहना चाहता हूं कि शायद हमारी तपस्या में ही कोई कमी रही होगी, जिसके कारण दीये के प्रकाश जैसा सत्य कुछ किसान भाइयों को हम समझा नहीं पाए। ‘आज मैं आपको, पूरे देश को, ये बताने आया हूँ कि हमने तीनों कृषि क़ानूनों को वापस लेने का निर्णय लिया है। इस महीने के अंत में शुरू होने जा रहे संसद सत्र में, हम इन तीनों कृषि क़ानूनों को रद्द करने की संवैधानिक प्रक्रिया को पूरा कर देंगे।”
आज जब यह शक किया जा रहा है कि ट्रम्प के साथ करार में किसानों के हितों के बलि चढ़ा दी गई है तो अखबार जो प्रचार कर रहे हैं उससे अलग, अकेले द टेलीग्राफ का शीर्षक है, (इस करार में) कृषि, डेरी क्षेत्र को लेकर कई बदलते संकेत हैं। दि एशियन एज का शीर्षक है, “अमेरिका के साथ व्यापार करार बड़ा निर्णय, सबके फायदे के लिए : प्रधानमंत्री”। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, “ट्रेड डील : ग्रेट फील”। इस खबर का उपशीर्षक पीयूष गोयल का कहा ही है, कृषि-डेयरी क्षेत्रों को पूर्ण संरक्षण दिया गया है। बीबीसी ने लिखा है, अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत के साथ ट्रेड डील को लेकर जो बड़े दावे किए हैं उन पर भारत ने स्थिति साफ़ नहीं की है। जाने-माने अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर बिस्वजीत धर कहते हैं कि जहां अमेरिका ने बहुत कुछ बोला है, वहीं भारत में इस पर सरकार ने चुप्पी साधी हुई है। वह कहते हैं, “ट्रंप के आने से पहले भारत पर जो टैरिफ़ औसतन सिर्फ़ ढाई फ़ीसदी लगता था वह अब 18 फ़ीसदी हो गया है और भारत जो अमेरिका पर लगाता था अगर वह शून्य हो जाता है तो ये तो बिल्कुल ही एक तरह से उलटफेर हो गया है। भारत का बहुत ज़्यादा घाटा है इसमें। हमारे वित्त मंत्री ने भी कहा कि एमएसएमई को सपोर्ट करना है क्योंकि उनकी क्षमता कम है. अब आप अगर मार्केट को पूरी तरह से खोल देते हैं तो एमएसएमई का बहुत बड़ा नुक़सान है।”
आज अखबारों के शीर्षक औऱ प्रधानमंत्री के सम्मान की खबर से लगता तो है कि सब ठीक है लेकिन बीबीसी की इस खबर के साथ अखबारों की खबरों से भी साफ है कि भारत ट्रम्प की शर्तें मानने से अलग शायद ही कुछ कर रहा हो या कर पा रहा हो। उदाहरण के लिए अमर उजाला ने लिखा है, अमेरिकी व्यापार वार्ता प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर ने गोयल के बयान की यह कहकर पुष्टि की कि भारत कृषि उत्पादों पर कुछ संरक्षण बनाए रखेगा। उन्होंने कहा, ट्रम्प प्रशासन व्यापार समझौते को लिखित रूप देने में जुटा है। अमर उजाला ने पक्ष-विपक्ष में वार-पलटवार के तहत एक सवाल जवाब को शीर्षक के रूप में छापा है। सवाल है – जानकारियां ट्रम्प क्यों दे रहे हैं, गोयल बोले – टैरिफ उन्होंने लगाया, हटाने की घोषणा वही करेंगे। आप जानते हैं कि ट्रम्प ने भारत संबंधी घोषणाएं भी की थीं और प्रधानमंत्री की पोस्ट इन मुद्दों पर शांत थी। अब यह जवाब और खबर कि ट्रम्प प्रशासन व्यापार समझौते को लिखित रूप देने में जुटा है। फिर भी पीयूष गोयल के दावे को मिली प्रमुखता और उसे शीर्षक बनाना हेडलाइन मैनेजमेंट का नतीजा ही हो सकता है। अमर उजाला की एक और खबर के अनुसार रूस को तेल खरीद रोकने का संदेश नहीं मिला है। दूसरी ओर खबर थी कि भारत रूस से तेल नहीं खरीदेगा तब टैरिफ 18 प्रतिशत होगा। द टेलीग्राफ की खबर में लिखा है, … इससे पहले अमेरिकी कृषि सचिव ब्रूक रोलिंस ने भारत के साथ ट्रेड डील के ज़रिए अमेरिकी किसानों के लिए “एक बार फिर” काम करने के लिए ट्रम्प को धन्यवाद दिया। इससे यह अटकलें लगने लगीं कि मोदी सरकार ने ट्रंप के दबाव में आकर राजनीतिक रूप से संवेदनशील और रोज़गार पैदा करने वाले कृषि और डेयरी सेक्टर को खोलने के लिए समझौता कर लिया है। …. शाम में, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने सीएनबीसी को बताया कि भारत कृषि उत्पादों के आसपास “कुछ सुरक्षा” बनाए रखेगा, लेकिन दावा किया कि “…कई चीज़ों जैसे बादाम, अखरोट, काजू, पिश्ता जैसे पेड़ पर होने वाले मेवे और सामान्य फल, शराब, सब्जियां, वगैरह पर टैरिफ़ शून्य हो जाएगा”। इसलिए, टेलीग्राफ का शीर्षक है, कृषि और डेरी उत्पादों पर बदलते संकेत। अखबार ने प्रधानमंत्री के दावे को भी इतना ही महत्व दिया है और बीच में सम्मान या माला पहनाने की फोटो भी है। अखबार का फ्लैग शीर्षक है, गोयल ने कहा दोनों क्षेत्रों की रक्षा की जाएगी अमेरिकी अधिकारियों को अमेरिका के किसानों के लिए लाभ दिख रहा है।
मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।
|