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भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता - लंबी बातचीत के बाद बनी सहमति

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Image Source:  Getty

                                                       
                                               
                                                       
                                       


                                                                                               

                                               
हाल के हफ़्तों में भारत और पाकिस्तान के बीच चल रही तनातनी के बीच एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम को नज़रंदाज़ कर दिया गया. दरअसल, 6 मई, 2025 को भारत और ब्रिटेन ने तीन साल से अधिक समय तक चली बातचीत के बाद मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर सहमति बना ली. यह बातचीत जनवरी 2022 में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्रिटिश कंजर्वेटिव पार्टी के नेतृत्व में शुरू हुई थी. इस बीच चार प्रधानमंत्रियों ने ब्रिटेन की सत्ता संभाली और इस समझौते को लेकर कई बार समय-सीमा भी बदली गई. अब जाकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर और लेबर पार्टी के नेतृत्व में, जो जुलाई 2024 में सत्ता में आई है, यह समझौता अपने आख़िरी नतीजे पर पहुंच सका है.



भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार संधि को दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण व्यापार समझौता माना जा रहा है. ब्रिटेन के लिए यह ब्रेग्जिट के बाद व्यापार नीति और आपसी जुड़ाव का एक मज़बूत प्रतीक है, क्योंकि वह 2020 में ही यूरोपीय संघ (EU) और ‘यूरोपीय एकल बाजार’ से बाहर निकल गया था.



भारत के लिए सबसे बड़ा  फ़ायदा यही होगा कि उसके 99 प्रतिशत निर्यात पर ब्रिटेन सीमा शुल्क (टैरिफ) नहीं लगाएगा. कपड़ा और पोशाक जैसे भारत के श्रम-प्रधान क्षेत्रों को विशेष रूप से ब्रिटेन के कम टैरिफ से फ़ायदा मिलने की संभावना है. इन पर अभी 10 प्रतिशत सीमा शुल्क लगाया जाता है और बांग्लादेश जैसे देशों से इनको कड़ा मुक़ाबला करना पड़ता है. इंजीनियरिंग उत्पाद, ऑटो पार्ट, कैमिकल, रत्न व आभूषण, चमड़ा, खेल के सामान और खिलौने अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं, जिनको टैरिफ के कम होने से लाभ मिलेगा. भारत की महत्वाकांक्षा साल 2030 तक 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का सालाना व्यापारिक निर्यात करना है. इसमें यह समझौता काफ़ी मददगार साबित हो सकता है.


दूसरी ओर, भारत भी ब्रिटेन के 90 प्रतिशत उत्पादों पर टैरिफ कम करेगा, जिनमें से 85 प्रतिशत सामान एक दशक के भीतर टैरिफ से मुक्त हो जाएंगे. इन उत्पादों में शामिल हैं- चिकित्सा उपकरण, मशीनरी, हवाई जहाज के पुर्ज़े, भेड़ का बच्चा, सैमैन मछली, सॉफ़्ट ड्रिंक, चॉकलेट, बिस्कुट और सौंदर्य-प्रसाधन के सामान. शराब और ऑटोमोबाइल दो ऐसे महत्वपूर्ण क्षेत्र रहे हैं, जो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति के विशेष निशाने पर रहे हैं. इन पर भी भारत में टैरिफ कम किया जाएगा. ब्रिटिश व्हिस्की व जिन जैसे पेय पदार्थों पर भारतीय टैरिफ 150 प्रतिशत से घटाकर 75 प्रतिशत किया जाएगा, जो अगले 10 वर्षों में और घटाकर 40 प्रतिशत तक कर दिया जाएगा. इसी तरह, ब्रिटिश ऑटोमोबाइल पर सीमा शुल्क 110 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत किया जाएगा. हालांकि, कार के निर्यात के लिए इसमें कोटा तय किया गया है और समझौते के मुताबिक, ब्रिटेन हर साल भारत को 22,000 प्रीमियम इलेक्ट्रिक गाड़ियां (EV) निर्यात करेगा, बदले में भारत भी ब्रिटेन में निम्न और मध्यम श्रेणी की इलेक्ट्रिक गाड़ियां कोटे के तहत भेजेगा.


प्रवासन के मुद्दे पर भले ही समझौते की बातचीत में खूब ज़ोर दिया गया, लेकिन कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर सेवा देने वालों, रसोइयों, संगीतकारों और योगियों सहित कुछ ख़ास क्षेत्रों में काम करने वाले भारतीय पेशेवर कहीं अधिक आसानी से अब ब्रिटेन जा सकेंगे. हालांकि, आईटी और स्वास्थ्य सेवा में पेशेवरों का कोटा बढ़ाने की नई दिल्ली की मांग अब भी पूरी नहीं हो सकी है.



एक ‘डबल कंट्रीब्यूशन कन्वेंशन’ (दोहरे अंशदान समझौते) पर भी सहमति बनी है, जो अस्थायी रूप से ब्रिटेन में काम करने वाले भारतीयों और भारत में काम करने वाले ब्रिटिशों को तीन साल के लिए सामाजिक सुरक्षा में भुगतान करने से राहत देगा. इस फ़ैसले का मक़सद कर्मचारियों को कई सामाजिक सुरक्षा सेवाओं में भुगतान करने में छूट देना है. यह कन्वेंशन जहां ब्रिटेन में भारतीय पेशेवर सेवा-क्षेत्रों के लिए मौके बढ़ाने का काम करेगा, वहीं ब्रिटिश व्यवसाय भी कहीं अधिक आसानी से भारत की प्रतिभाओं तक पहुंच सकेंगे, साथ ही उनका आना-जाना भी आसान हो जाएगा. इससे भारतीय नियोक्ताओं को 20 प्रतिशत की बचत हो सकेगी और 4,000 करोड़ रुपये का आर्थिक लाभ मिल सकेगा. हालांकि, इस कन्वेंशन का ब्रिटेन के विपक्षी नेताओं ने विरोध किया है, क्योंकि उनका मानना है कि इससे ब्रिटिश श्रमिकों के लिए अवसर कम हो जाएंगे. इन श्रमिकों के लिए राष्ट्रीय बीमा में अंशदान बढ़ाया गया है और ‘दो स्तर’ की कर व्यवस्था की गई है.  


इस समझौते के बाद ब्रिटिश कंपनियां भारत की निविदाओं (टेंडर) में बोली लगा सकेंगी और यहां के विशाल सरकारी खरीद बाजार तक पहुंच सकेंगी. ‘वे कम से कम 38 अरब ब्रिटिश पाउंड मूल्य की लगभग 40,000 निविदाओं के लिए बोली लगा सकेगीं’. भारत ने अपने रुख़ को नरम करते हुए समझौते में श्रम अधिकारों, पर्यावरण मानकों, भ्रष्टाचार विरोधी उपायों और लैंगिक समानता पर भी चर्चा की, जबकि पारंपरिक रूप से व्यापार समझौतों में भारत ऐसे क्षेत्रों को शामिल करने से बचता रहा है.



घरेलू बाजार को सुरक्षा देने के लिए डेयरी उत्पाद, सेब और पनीर जैसे संवेदनशील कृषि उत्पादों पर टैरिफ लागू रहेंगे.


इस समझौते में कानूनी सेवाओं का कोई ज़िक्र नहीं है, जो ब्रिटिश अर्थव्यवस्था में हर साल 57.8 अरब ब्रिटिश पाउंड का योगदान देती हैं. इसीलिए ब्रिटेन की लॉ सोसाइटी ने इसे ‘अवसर से चूक जाना’ बताया है. भले ही, भारतीय नियमों में कुछ हद तक बदलाव किए गए हैं, जिसके अनुसार विदेशी कंपनियों को स्थानीय भागीदार के बिना भारत में वकालत करने की अनुमति मिल जाती है, पर इसके लिए कुछ शर्तें भी लगाई गई हैं. भारत अपने सेवा क्षेत्र को पारंपरिक रूप से खोलने का इच्छुक नहीं रहा है, जो देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 50 प्रतिशत से अधिक का योगदान देता है.



महत्वपूर्ण बात यह है कि मुक्त व्यापार समझौता ब्रिटेन के ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM)’ से भारत को राहत नहीं देता है. यह मैकेनिज्म 1 जनवरी, 2027 से लागू होने वाला है, जिसका उद्देश्य कार्बन उत्सर्जन बढ़ाने वाले उत्पादों जैसे- लोह, इस्पात और उर्वरकों पर उनके कार्बन-उत्सर्जन के आधार पर टैरिफ लगाना है. भारत और ब्रिटेन के बीच विवाद के इस बड़े मसले पर बातचीत जारी रहने की उम्मीद है. इसी तरह, भारत द्वारा 2016 में द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) स्थगित करने के बाद निवेश की सुरक्षा और विवादों के समाधान के लिए इस संधि को अंतिम रूप देने के लिए भी बातचीत जारी रह सकती है.



इस समझौते के बाद भारत और ब्रिटेन के बीच आपसी व्यापार बढ़ने की उम्मीद है. अभी यह कारोबार 42 अरब पाउंड का है, जो 2040 तक हर साल 25.5 अरब पाउंड बढ़ सकता है. 2024 में भारत ब्रिटेन का 12वां सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार था, जबकि ब्रिटेन भारत का 14वां सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार, और भारत के कुल व्यापार का सिर्फ़ 2.4 प्रतिशत ब्रिटेन से हुआ था. ऐसे में, इस समझौता से नवाचार में तेज़ी आने, नौकरियां पैदा होने और अधिक व्यापार व निवेश की उम्मीद है.


भरोसेमंद व्यापारिक भागीदारों के साथ व्यापार समझौते भारत और ब्रिटेन, दोनों देशों की प्राथमिकता में रहे हैं. भारत के 1.5 अरब लोगों का विशाल बाजार और स्थिर अर्थव्यवस्था ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को नया जीवन देने में मददगार मानी जा रही है. उल्लेखनीय है कि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था इन दिनों महंगाई, वैश्विक अस्थिरता और रूस-यूक्रेन युद्ध के आर्थिक असर से जूझ रही है. इतना ही नहीं, भारत के साथ यह व्यापारिक समझौता ब्रिटेन के ‘हिंद-प्रशांत की ओर झुकाव’ के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो ‘ग्लोबल साउथ’ (वैश्विक दक्षिण) से उसके जुड़ने और ब्रेग्जिट के बाद की उसकी महत्वाकांक्षाओं से काफ़ी हद तक जुड़ा है.



इस समझौते से भारत में ब्रिटेन का निर्यात करीब 60 प्रतिशत (15.7 अरब पाउंड) तक बढ़ सकता है, जबकि ब्रिटेन में भारत का निर्यात केवल 25 प्रतिशत (9.8 अरब पाउंड) तक बढ़ने का अनुमान है. अगर यही अनुमान सच होते हैं, तब भी ट्रंप की विघटनकारी नीतियों और चीन पर निर्भरता के बीच एक-दूसरे के बाजारों तक इस तरह पहुंचने का यह समझौता दुनिया की पांचवी (भारत) और छठी (ब्रिटेन) अर्थव्यवस्थाओं को बाहरी झटकों से बचाने और आर्थिक सुरक्षा बढ़ाने में मददगार साबित होगा. उल्लेखनीय है कि भारत क्षेत्रीय व्यापक व्यापारिक भागीदारी (RCEP) या ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप के लिए व्यापक और प्रगतिशील समझौता (CPTPP) जैसे प्रमुख व्यापारिक मंचों से अब भी दूर है.


अब इंतजार इस बात का है कि दोनों देशों की संसद कब इस समझौते को स्वीकार करती है. ऐसा होते ही यह मुक्त व्यापार समझौता भारत और ब्रिटेन की रणनीतिक साझेदारी को कहीं अधिक मज़बूती से आगे बढ़ाएगा, जो अभी ‘रोडमैप 2030’ द्वारा आगे बढ़ रही है.


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