
UGC Regulations: सुप्रीम कोर्ट ने जातिगत भेदभाव की परिभाषा से संबंधित यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगा दी है. कोर्ट ने नए नियमों पर सवाल उठाने वाली याचिकाओं पर केन्द्र सरकार और यूजीसी को नोटिस भी जारी किया है. मामले की सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने कहा कि फिलहाल 2012 के रेगुलेशन लागू रहेंगे. CJI ने यह भी कहा कि ये बहुत गंभीर मामला है. अगर हम दखल नहीं देंगे तो समाज के लिए विभाजनकारी हो सकता है और इसके खतरनाक परिणाम हो सकते हैं.
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Advertising सुनवाई के दौरान CJI ने कहा कि आरक्षित समुदाय के सदस्यों के लिए निवारण प्रणाली लागू रहनी चाहिए. CJI ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए हम निर्देश देते हैं कि अगले आदेश तक 2012 के नियम लागू रहेंगे. भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी. अब इस मामले की अगली सुनवाई सुप्रीम कोर्ट 19 मार्च को करेगा.
इस मामले में याचिकाकर्ता के वकील ने कहा था कि यूजीसी के नए नियम सामान्य वर्ग के लोगों के साथ भेदभाव कर सकते हैं और उनके लिए प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र से इनकार करने पर चिंता जताई थी. याचिका यूजीसी के इक्विटी नियमों को चुनौती देती है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि यह ढांचा गैर-एससी/एसटी/ओबीसी श्रेणियों से संबंधित व्यक्तियों को शिकायत निवारण तंत्र से वंचित करके भेदभाव को संस्थागत बनाता है.
इसमें तर्क दिया गया कि ये नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और उपायों तक निष्पक्ष पहुंच के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं. याचिका के अनुसार, यह नियम 'जाति-आधारित भेदभाव' के दायरे को केवल 'अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग' के सदस्यों तक सीमित करता है.
बता दें कि यूजीसी के नए नियमों का उद्देश्य कैंपस पर जाति, धर्म, लिंग, जन्मस्थान, विकलांगता आदि के आधार पर होने वाले भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करना था. इन नियमों के तहत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों (विश्वविद्यालयों और कॉलेजों) में इक्विटी कमेटी गठित करने का प्रावधान है जो शिकायतों की जांच करेगी और दोषियों पर सख्त कार्रवाई (जैसे डिग्री रोकना, संस्थान की मान्यता रद्द करना आदि) कर सकेगी.
यूजीसी के आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव की शिकायतें 118 प्रतिशत बढ़ी हैं. ये नियम सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर तैयार किए गए थे जहां एक पुरानी याचिका में कैंपस पर भेदभाव रोकने के लिए मजबूत तंत्र की मांग की गई थी. यूजीसी ने 13 जनवरी को इन नियमों को अधिसूचित किया जिसके बाद कई संस्थानों को इक्विटी कमेटी बनाने और भेदभाव विरोधी नीति लागू करने के निर्देश दिए गए.
इन नियमों के लागू होते ही विरोध भी शुरू हो गया. यूजीसी के नए नियम के नियम 3(सी) को मनमाना, भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक बताते हुए इसका विरोध किया गया. नए नियमों को रद्द करने की मांग करने वाली याचिका में कहा गया है कि यह प्रावधान उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नाम पर कुछ वर्गों (खासकर सामान्य वर्ग) के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा देता है और इससे कुछ समूहों को शिक्षा से बाहर किया जा सकता है.
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