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यूजीसी विवाद पर अवर्ण-सवर्ण पक्ष!

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पुष्य मित्र-





UGC विवाद… इतना शोर हुआ तो मैंने भी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की अधिसूचना को पढ़ लिया। पढ़कर समझ आया कि…









फिर भी लोग पगलाए हैं और क्रुसेड करने पर उतारू हैं, धर्मयुद्ध की चेतावनियां हैं, उसे देखकर सिर्फ हंसी आती है।





और हां, यह बिल्कुल व्यक्तिगत टिप्पणी है।









दयाशंकर शुक्ला सागर-





इस देश में सवर्ण ऐतिहासिक अपराधी हैं। राजनेताओं की मान्यता है कि पूर्वजों ने जो जु़ल्म किए उसकी सज़ा सवर्णों को वर्तमान पीढ़ी को दी जानी चाहिए। इसलिए ऐसे तमाम कानून बने हैं जो गैर सवर्णों को अतिरिक्त सुरक्षा व सुविधा देते हैं। देखा जाए तो ये कानून संविधान के समानता के मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण करते हुए भेदभाव करते हैं। सिर्फ जाति आधारित ही क्यों? भेदभाव किसी भी आधार पर हो वह गलत होना चाहिए। आपत्तिजनक टिप्पणी करने का अधिकार किसी को नहीं होना चाहिए। चाहे वह सवर्ण हो या गैर सवर्ण। मुझे तो लगता है कि सवर्ण या गैर सवर्ण जैसी शब्दावलियां भी नहीं होनी चाहिए। क्या इंसान होना काफी नहीं है।





यूजीसी के नए कानून से सवर्ण नाराज़ हैं। इस कानून को सभी दलों ने मिलकर ड्राफ्ट किया है। इसलिए नहीं कि वे दलित-पिछड़ों को लेकर संवेदनशील हैं बल्कि इसलिए कि उनका एक बड़ा वोटबैंक है। राजनेता कभी नहीं चाहेंगे कि देश में जाति की दीवार ढह जाए। जातियां रहेंगी तभी वोट की राजनीति संभव हो सकेगी। जहां तक इन नियमों के विरोध का सवाल है वह गलत भी नहीं है। नए कानून में जनरल कैटेगरी के छात्रों को भेदभाव का शिकार माना ही नहीं गया है जिसको लेकर विरोध हो रहा है। सवर्ण समाज के लोगों का कहना है कि इन नियमों का फायदा उठाकर कोई भी छात्र सवर्णों को फंसाने के लिए झूठी शिकायत कर सकता है। कोई भी कमेटी ये पहचान कैसे की सकती है कि कोई शिकायत व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता के कारण उत्पन्न हुई है या जाति आधारित भेदभाव के कारण।





छात्रों का कहना है कि इसमें झूठी शिकायतों पर कार्रवाई का प्रावधान नहीं है। इस वजह से किसी पर भी बिना किसी सबूत के झूठे आरोप लगाए जा सकते हैं। इस वजह से किसी पर भी बिना किसी सबूत के झूठे आरोप लगाए जा सकते हैं। इससे किसी भी छात्र को परेशानी होगी और उनका शिक्षण और करियर प्रभावित होगा। मजे की बात कि इस कानून में इक्विटी कमेटी में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व को जरूरी नहीं बताया गया है। जबकि इक्विटी स्क्वाड को बेहिसाब अधिकार दे दिए गए हैं। सबसे बड़ी बात यह कि इसमें ‘भेदभाव’ की कोई तय परिभाषा नहीं दी गई है।





यानी कौन-सी बात किसे कब बुरी लग जाए कोई कैसे समझ सकता है। एक जमाने में मेरे एक वरिष्ठ और प्यारे सहयोगी थे महेश वाल्मीकि। मेरे सीनियर थे, इसलिए उनका नाम का संबोधन कर उन्हें ‘महेश’ पुकारना मुझे थोड़ा अशिष्ठ लगता था तो मैं हमेशा उन्हें सम्मान से ‘वाल्मीकिजी’ कह कर सम्बोधित करता था। एक दिन उन्होंने इसी बात पर मेरी शिकायत मेरे संपादक से कर दी कि ये जनाब मुझे मेरे जातिसूचक शब्द से सम्बोधित करते हेँ। मैं दंग रह गया। जबकि ऐसी कोई बात कभी मेरे ख्वाबो ख्याल में नहीं रही थी। अब ये मित्र अगर मेरी शिकायत किसी कालेज के इक्विटी स्क्वाड से कर दें तो इक्विटी स्क्वाड ये कैसे तय करेगा कि मेरी मंशा क्या थी?





जाहिरी तौर पर यूजीसी के Equity Rule का सेक्शन 3(C) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और व्यक्तिगत आजादी जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। यह नियम यूजीसी अधिनियम 1956 के विरुद्ध है और उच्च शिक्षा में समान अवसर देने के अवसर को खत्म करता है।





UGC ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिपोर्ट सौंपी थी जिसमें जातिगत भेदभाव के आंकड़े दिए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतें 2017-18 में 173 थीं, जो 2023-24 में बढ़कर 378 हो गईं। जबकि इन संस्थानों में गैर सवर्णों की संख्या कोई 25 लाख है। ये आंकड़े UGC के अपने डेटा से हैं, जो पार्लियामेंट कमिटी और सुप्रीम कोर्ट को दिए गए। रिपोर्ट के अनुसार इनमें आधी शिकायतें झूठी पाई गईं। यानी उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की दर 0.000001 फीसदी से भी कम है। फिर इस तरह के भेदभाव से भरे कानून की क्या जरूरत जिससे समाज में वैमनस्य की खाई और बढ़े।









दयानंद पांडेय-





सत्ता की हुसियारी के नशे में चूर मोदी कीभुजिया बनाने को तैयार खड़े हैं उन के वोटर





दयानंद पांडेय





कोई माने या न माने पर यू जी सी एक्ट को ले कर भाजपा की मोदी सरकार ने अपनी कब्र खोद ली है l सारी बढ़त को गुड़ गोबर में तब्दील कर लिया है l अब आगे कुआं , पीछे खाई है l अब यह एक्ट वापस लेने पर दलित , ओ बी सी देश में आग लगा देंगे l





सवर्ण आग तो नहीं लगा सकते पर बुद्धि तो लगा ही सकते हैं l लगाएँगे l पक्का लगाएँगे l फिर मोदी सरकार क्या करवट लेती है , देखना दिलचस्प होगा l आख़िर कब तक राहुल गांधी जैसे मूर्ख को सामने रख कर सवर्ण वोटर को मोदी सरकार ब्लैकमेल करती रहेगी l कि हम को हटाया तो राहुल आ जाएगा l





लोगों को क्या लगता है कि अविमुक्तेश्वरानंद के पक्ष में जो तमाम सवर्ण बरैया की तरह अफ़ना कर , तमतमा कर खड़े हो गए हैं , वह सचमुच अविमुक्तेश्वरानंद के साथ हैं ?





एक नहीं हैं l लेकिन यू जी सी एक्ट का प्रेशर इतना ज़बरदस्त है कि सब इसी बहाने फूट पड़े हैं l ऐसे जैसे कोई फोड़ा फूट गया हो l मुट्ठी भींच कर , हाथ उठा कर लोग खड़े हो गए हैं l प्रेशर कुकर सीटी के अभाव में फट पड़ा है l आरक्षण 85 प्रतिशत करने की तैयारी साफ़ दिखती है l 2029 में मोदी के पास चुनाव जीतने के लिए 85 प्रतिशत आरक्षण के अलावा और कोई कार्ड रह भी नहीं गया है l यू जी सी तो जल में फेंका हुआ एक कंकड़ मात्र है l तैयारी आरक्षण का कोटा बढ़ाने की है l लेकिन वह कहते हैं न कि धोबी का कुत्ता न घर का , न घाट का l





विश्वनाथ प्रताप सिंह की याद कीजिए l एक खल राजनीतिज्ञ शरद यादव उन का मुख्य सलाहकार बन गया l बता दिया कि मंडल लागू कीजिए l अंबेडकर से बड़े नेता बन जाएंगे आप l गांव-गांव आप की मूर्तियां लग जाएंगी l गांव-गांव मूर्तियां तो नहीं लगीं विश्वनाथ प्रताप सिंह की पर गालियां आज भी गांव-गांव से मिलती हैं l उन की राजपूत बिरादरी सब से ज़्यादा गाली देती है उन को l देश अगड़ा-पिछड़ा में बंट गया l नफ़रत की दीवार खड़ी हो गई l बंटोगे तो कटोगे का नफ़रती नारा आ गया l यह वही विश्वनाथ प्रताप सिंह था जिस ने उत्तर प्रदेश का मुख्य मंत्री रहने पर मंडल मसले पर फ़ाइल में लिखा था कि अगर लागू किया तो आग लग जाएगी l फिर प्रधान मंत्री बन कर देश में आग लगा दी l लालू , मुलायम जैसे भ्रष्टाचारी और जातिवादी नेता खड़े कर दिए l





कोढ़ में खाज यह कि विश्वनाथ प्रताप सिंह से आगे बढ़ कर कांग्रेस के अर्जुन सिंह ने नौकरियों से आगे जा कर एडमिशन में भी आरक्षण के ज़हर का तड़का दे दिया l परिणाम यह है कि अब बेस्ट फ़ेल्योर मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं l





मोदी सरकार अब चाहती है कि सवर्ण पढ़ें भी नहीं l सो यू जी सी एक्ट की चादर बिछा दी है l यह एक नई मजार है l जिस पर जातीय सौदागर रोज चादर बिछायेंगे l चढ़ावा चढ़ाएंगे l मोदी बेटा इसी मजार के बूते फिर-फिर सरकार बनाएंगे l डराएंगे , राहुल गांधी जैसे मूर्ख का पुतला सामने रख कर कि वोट दो भाजपा को नहीं यह लतीफ़ा आ जाएगा l





मोदी का क्या है कि अपने भाषण में बताया कि भाजपा अध्यक्ष नीतिन नबीन हमारे बॉस हैं और हम कार्यकर्ता l दूसरे ही क्षण नबीन को साथ-साथ सीढ़ियाँ उतरते हुए हाथ पकड़ कर पीछे खड़ा कर दिया l हैसियत बताई कि बेटा भाषण में बॉस हो l हक़ीक़त में हमारे बग़ल बच्चा l







मोदी भाजपा वोटर को भी नितिन नबीन समझने की होशियारी में हैं l वह एक पुराना शेर है :





अपन मस्त हो कर देखा इस में मज़ा नहीं हैहुसियारी के बराबर कोई नशा नहीं है l





मोदी इसी शेर के अब तलबगार हैं l फ़िलहाल बंगाल और केरल इन की इस हुसियारी की भुजिया बनाने के लिए लालायित हैं l बाक़ी देश भी मचल रहा है l मोदी को लेकिन होश नहीं है l हुसियारी का नशा सिर चढ़ कर बोल रहा है l फ़िलहाल विश्वनाथ प्रताप सिंह और शरद यादव कैसे बेनाम मौत मरे, लोग जानते हैं l ठीक से ख़बर भी नहीं बन पाए l घुट-घुट कर मरा l शरद यादव तो एक सरकारी घर के लिए नाक रगड़ता रहा l मोदी भी शरद यादव और विश्वनाथ प्रताप सिंह की राह चल पड़ा है l जातीय आग लगा कर गुमनाम मृत्यु की राह पर l सारी विश्व कूटनीति और आर्थिक तरक्की के लोहबान काम नहीं आएंगे l सब धरे रह जायेंगे l





मोदी के इस कुकर्म को जो अभी नहीं रोका गया तो बहुत गड़बड़ हो जाएगा l यह मोदी बहुत ख़तरनाक खेल खेल रहा है l सरकार बनाने और बचाने के इस खेल में देश को खोखला कर देगा l देश को प्रतिभाहीन कर देगा l देश से डाक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक ख़त्म हो जाएंगे l बेस्ट फ़ेल्योर से कब तक कोई देश चल सकता है ?





अफ़सोस कि ससुरी कांग्रेस के पास जो रीढ़ होती , कायदे का नेता होता तो यह सब इतना एकतरफा नहीं होता l इतना लाचार , लचर , कायर और नपुंसक विपक्ष l राहुल जैसा लतीफ़ा और नशेड़ी नेता प्रतिपक्ष !





अब वोटर जाए कहां ?





राहुल गांधी के पास जाएंगे ? बिल्कुल नहीं l विकल्प नए भी बन सकते हैं और कि बनेंगे l









रवीश रंजन शुक्ला-





उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता के मूल्यों को स्थापित करने के लिए UGC ने एक 13 जनवरी को गजट निकाला..इस गजट को इसलिए निकालना पडा क्योंकि जातिए भेदभाव की शिकायतें लगातार बढ़ रही थी..2017-18 में 173 मामले आए 2023-24 में 375 मामले आए…UGC के इस गजट का जितना विरोध हो रहा है क्या उतना है ये ?? पहली बात गजट में लिखा है धर्म, नस्ल,जाति , विकलांगता, जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को खत्म करने के लिए नियमों में बदलाव किए जा रहे हैं…





सबसे ज्यादा लोगों को आपत्ति है कि “ जाति आधारित भेदभाव के अन्तर्गत अनुसूचित जाति या जनजाति और पिछड़ा वर्ग के विरुद्ध जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव करना “ है…दोस्तों इसमें क्या ग़लत है…जातिसूचक गाली देकर किसका अपमान किया जाता है…बताने की जरुरत नहीं है..





सामान्य वर्ग के विरोध करने वाले लोगों को लगता है कि इसको लिख देने भर से उच्च शिक्षा संस्थान में पढ़ने वाला हर सामान्य वर्ग का छात्र जेल चला जाएगा…





ऐसा नहीं है अगर पीड़ित पक्ष शिकायत करता है तो बाक़ायदा समानता समिति इसकी जाँच करेगा..समानता समिति में यूनिवर्सिटी या कॉलेज के संभ्रांत शिक्षाविद समाज सेवी शामिल होंगे…वो जाँच करेंगे और शिकायत का मतलब सीधे जेल भेजना नहीं है…हो सकता है कि कुछ अनुशासनात्मक कदम उठाए जाएँ..गजट में सिर्फ जाति के आधार पर भेदभाव का ज़िक्र नहीं है बल्कि आर्थिक आधार या लैंगिक भेदभाव की भी शिकायत हो सकती है..तो भाई इसमें क्या ग़लत है…पता नहीं लोगों को ऐसा क्यों लगता है कि इस नियम के आने के बाद सामान्य वर्ग के छात्र जेल चले जाएँगे…जाति के आधार पर क्यों किसी बच्चे को अपमान झेलना पड़े..क्या इसे मिटाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए..





फिर नियम कोई पत्थर की लकीर तो है नहीं इसमें वक्त के साथ संशोधन भी हो सकता है… बहुत सारे लोग तो बस बिना गजट को पढ़े ही हैश टैग के आधार पर विरोध करने लगे हैं…




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