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नोएडा इंजीनियर मौत: व्यवस्थागत खामियां और आपदा कुप्रबंधन की खुली पोल, प्रशासनिक लापरवाही से डगमगाया जनता का विश्वास

LHC0088 Yesterday 15:26 views 872
  

नोएडा में इसी स्थान पर एक युवा इंजीनियर की डूबने से मौत हुई थी। फोटो सौजन्य- जागरण ग्राफिक्स



मनु त्यागी, नोएडा। बीते सप्ताह नोएडा में बेसमेंट के लिए खोदे गए प्लाट में भरे हुए पानी में डूबने से एक इंजीनियर की मौत हो गई। इसके बाद कई प्रकार की व्यवस्थागत खामियां भी सामने आई हैं। हालांकि सरकार और प्रशासन का पहला प्रयास तो यही होना चाहिए कि इस तरह की परिस्थितियां निर्मित ही न हों, ताकि किसी दुर्घटना की आशंका बन सके, फिर भी यदि दुर्भाग्य से दुर्घटना घटित हो जाए तो उसके त्वरित प्रबंधन की पूरी व्यवस्था होनी चाहिए, जो नोएडा में इंजीनियर के डूबने के मामले में नदारद दिखी।

हाल ही में देश इस बात से स्तब्ध था जब एक साफ स्वच्छ शहर की मिसाल बने देश के ‘स्मार्ट शहर’ से दूषित पेयजल के कारण 20 से अधिक लोगों की मृत्यु होने के समाचार सामने आए। उसके बाद तो एक के बाद एक कई शहरों से दूषित जल पर सिस्टम की करगुजारियों की परतें खुलने लगी हैं। इसी बीच देश की राजधानी दिल्ली से सटे और एनसीआर का हिस्सा एवं उत्तर प्रदेश के शो विंडो बने स्मार्ट शहर गौतमबुद्ध नगर में एक नौजवान की बेसमेंट के लिए खोदे गए प्लाट में भरे पानी में डूबकर मौत हो गई।

  

सिस्टम झूठी जुबान से दावा करता रहा उसने कि बचाने की कोशिश की गई थी। लेकिन घटना वाली रात, 16 जनवरी को बेटे को बचाने के लिए पिता की संवेदनाएं उनके आसपास खड़े 150 से अधिक सिस्टम के लोगों के दिल-दिमाग को नहीं झंझोड़ पाईं थीं। लगभग दो घंटे की मशक्कत के बावजूद युवा युवराज अंततः सिस्टम की बेरुखी में विलीन हो गया।

उस युवक ने स्वयं को बचाने के लिए सभी संभावित उपाय किए- कार का बैलेंस पानी में न बिगड़े इसके लिए वह कार के ऊपर संतुलन बनाकर लेट गया, मोबाइल का टॉर्च जलाकर अपने स्थान के बारे में बताता रहा, परंतु बाहर खड़े लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और वह युवक पानी में डूब गया।

हालांकि इस घटना के बाद से ऐसा लग रहा है कि तंत्र में कंपन हुआ है, और फिलहाल ऐसा महसूस हो रहा है कि सिस्टम कुछ कर रहा है, लेकिन क्या आम आदमी को सिस्टम पर विश्वास बढ़ा? क्या आप विश्वास कर पा रहे हैं, इस बार जो हुआ वह वाकई दोबारा नहीं होगा, लेकिन आम नागरिक के सवाल सिस्टम से टकराते हैं। अब दोबारा कहीं ऐसे बेसमेंट के लिए खोदे गए प्लाट में जलभराव, दो साल तक यूं ही सिस्टम के आगे खुले ‘मौत के विंडो’ नहीं बने रहेंगे। ऐसा भरोसा जागना मुश्किल लगता है। ऐसे अनेक कारण हैं जिनके चलते आम लोग इस सिस्टम पर विश्वास नहीं कर पाते।
व्यवस्थागत खामियां

कई दिन से सुर्खियों में आया बेसमेंट के लिए खोदा गया यह प्लाट आज से नहीं, दो साल से ऐसी ही आसपास की छह-सात सोसायटी की जल निकासी का ‘माध्यम’ बना हुआ था। जिस प्रकार आपदा में अवसर होता है, ये ठीक उसी प्रकार था।

बिल्डर का किन्हीं विवादों के कारण काम रुका और वहां उसका सदुपयोग सिस्टम ने ऐसा कराया कि जल निकासी का जरिया बना दिया। चूंकि जिस जगह घटना हुई वह नोएडा का पाश इलाका बनने की ओर अग्रसर सेक्टर-150 है, जहां सभी नामी बिल्डर सोसायटी बना, बसा रहे हैं।

  

इस इलाके को बहुत तेजी से विकसित करने का लक्ष्य है। प्राधिकरण ने भी इसे प्रीमियम प्रोजेक्ट के तौर पर लोगों को बेचा था- सुनहरे भविष्य, लक्जरी सपने। लेकिन दुखद यह कि उसी से कुछ दूरी पर ऐसा डेथ प्वाइंट प्राधिकरण, प्रशासन और पुलिस की साझा लापरवाही से तैयार हो गया, जिसके बारे में किसी को नहीं पता था।

हां, उस रास्ते पर 90 डिग्री में बने जोखिम भरे रास्ते से सैकड़ों लोग दिन-रात गुजरते हैं। जी, आपके जेहन में बिलकुल वाजिब सवाल कौंध रहा है कि वो तमाम अधिकारी, जिन पर कार्रवाई हुई और जिस प्रकार उस रात उस घटनास्थल पर सिस्टम के 150 से अधिक जिम्मेदार लोग मौजूद थे, वो भी वहां से अक्सर गुजरते हैं, परंतु किसी ने कभी उस निर्माणाधीन बेसमेंट के जल भराव का कोई संज्ञान नहीं लिया। और तो और, जिन सोसायटीज की जल निकासी का पेच बीते एक दशक से अधिक से अटका हुआ था, उनका भी केवल कागजों में प्राधिकरण, सिंचाई विभाग के बीच पत्राचार विचरण हो रहा था, इस दुर्घटना के होते ही सब जाग गए, सिंचाई विभाग की जिद, अड़ियल रवैया सब नरम पड़ने लगे।

  

जाहिर है, लोकतंत्र के जिम्मेदार आंखें ही मूंदे थे। हालांकि अब भी इस बात की गारंटी नहीं है कि जहां-जहां ऐसे दुर्घटना आशंकित स्थल हैं, उनकी पहचान करते हुए वहां के जोखिम को दूर कर दिया जाए। आज शहरों की बनावट ही गवाही देती है कि खुले नाले, खुले मैनहोल, जलभराव, अधूरी सड़कें हर गली और सड़क पर जोखिम बनकर खड़े हैं। जब तक जिम्मेदार अधिकारी स्वयं नहीं जागेंगे, तब तक अगला हादसा टलने की कोई गारंटी नहीं है।

देश की राजधानी दिल्ली में महज डेढ़ साल पहले एक कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में पानी भरने से तीन छात्रों की जान चली गई थी। यदि उस घटना से सबक लेते हुए आपदा प्रबंधन की ठोस व्यवस्था बनी होती तो नोएडा की घटना शायद घटित नहीं होती।
जिम्मेदारों पर सजा कब बनेगी मिसाल?

जब निर्माणाधीन बेसमेंट के इस हादसे की बात हो रही थी, तो बार-बार जेहन में दिल्ली की वह घटना अपनी चर्चा के लिए स्मृति से बाहर निकलने को विचलित हो रही थी, जिसमें एक नामी कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में बरसात का पानी भरने के कारण तीन होनहार युवा उसमें डूब गए थे। इस घटना का याद आना अनायास नहीं है। ये इसलिए भी आज डेढ़ साल बाद भी उतना ही ताजा है, क्योंकि उस घटनाक्रम पर भले कोचिंग सेंटर पर कानूनी कार्रवाई चल रही है, पर बहुत जल्दी ही आरोपित जमानत पर भी छूट गए। क्या जांच पर भरोसा हुआ। क्या किसी वरिष्ठ अधिकारी को सजा हुई?

देश की राजधानी के विभिन्न विभागों में तैनात जिम्मेदार आइएएस अधिकारी, जो कभी उन तीन होनहार की तरह दिल्ली के इन्हीं कोचिंग संस्थानों में अभ्यर्थी भी रहे होंगे, वे बता दें कि क्या अब दिल्ली एनसीआर में कोचिंग की दशा सुधर गई? क्या ऐसी घटनाओं का खतरा टल गया है? अब कहीं पानी नहीं भरेगा, सब जगह जलभराव और ऐसे घटना स्थल खत्म हो गए।

  

आप ये सवाल कर सकते हैं, पर सिस्टम और सरकार इस बात का भरोसा नहीं दे सकता, क्योंकि कहीं भी कुछ दुरुस्त नहीं हुआ है। ऐसी ही न जाने कितनी ही घटनाएं हैं, …सब केवल समय के साथ अधूरे न्याय की आस वाले कागजी इतिहास बन जाती हैं। पूर्वी दिल्ली की दो साल पुरानी वह घटना भी याद आती है जब बरसात के दिनों में एक महिला अपने बच्ची के साथ पैर फिसलने के कारण नाले में गिर गई और लोक निर्माण विभाग और दिल्ली विकास प्राधिकरण नाला एक-दूसरे का बताते रहे, सब टालकर निकल गए। इसलिए आम आदमी सिस्टम पर भरोसा नहीं कर पाता।

लापरवाही पर दंड नहीं होता, मौतें आंकड़े बन जाती हैं, फाइलें धूल खा जाती हैं। आप और हम भी सवाल पूछना बंद कर देते हैं। बात जलभराव से जलजीवन तक की है, इंदौर के दूषित पानी घटनाक्रम में भी हाई कोर्ट की टिप्पणियां ही केवल जनचेतना को मरहम देती हैं। दूषित पानी पीने, लापरवाही से भरे दूषित पानी में डूबने का सिलसिला मानवीय जान के मोल को समझेगा, आपके मतदान के विश्वास को जीत पाएगा ये कहना मुश्किल है। स्मार्ट शहर, स्मार्ट मौतों की कहानियां बनते रहेंगे। इसलिए यह भी जरूरी है कि आपदा प्रबंधन को उसके वास्तविक अर्थों में भरोसेमंद बनाया जाए।
विकसित भारत की राह में बड़ी बाधा

भारत आज स्वयं को विकसित राष्ट्रों की पंक्ति में खड़ा देखने का सपना देख रहा है। हाल ही में वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने भी ‘विकसित भारत’ देश की दिशा में एक अहम बात कही थी कि ‘केवल आर्थिक शक्ति से ही किसी राष्ट्र की संप्रभुता की रक्षा नहीं हो सकती।’ उनका यह संदेश भले रक्षा क्षेत्र को केंद्रित करते हुए था, लेकिन इसकी सामयिकता मानवीय जीवन के मोल को भी अभिव्यक्त करती है आर्थिक शक्ति के साथ सामाजिक शक्ति भी उतनी ही मूल्यवान है।

वर्ष 2047 तक “विकसित भारत” का संकल्प केवल एक राजनीतिक कथ्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आकांक्षा, भावनाओं के रूप में प्रस्तुत करता है। जीडीपी ग्रोथ, इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टार्टअप इकोसिस्टम और डिजिटल इंडिया जैसे शब्द हमारी प्रगति के प्रमाण हैं। आर्थिक वृद्धि, बुनियादी ढांचे का विस्तार और स्मार्ट सिटी जैसे प्रोजेक्ट इसकी नींव के रूप में देखे जा रहे हैं।

हमारे सामने विकास के इस ‘आत्मविश्वासी मॉडल’ के समानांतर एक कड़वी सच्चाई भी मौजूद है कि आम नागरिक आज भी मूलभूत सुविधाओं और सुरक्षा के अभाव में अपनी जान गंवा रहा है, जिसका बार-बार टूटते-डूबते भरोसे के रूप में वर्णन भी किया है। दूषित पानी, जलभराव और खुले नालों से होने वाली मौतें यह सवाल खड़ा करती हैं कि क्या हमारा शहरी विकास वास्तव में नागरिक-केंद्रित है या सिर्फ कागजी और प्रचार आधारित। यह कोई नई प्रवृत्ति नहीं है कि सिस्टम किसी बड़े हादसे के बाद ही जागता है।

  

सरकारी तंत्र को समाप्त करना समाधान नहीं है, लेकिन तंत्र को जवाबदेह बनाना अनिवार्य है। हर हादसे में जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, सिर्फ नैतिक नहीं, कानूनी भी। एक दशक पहले भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासनिक व्यवस्था की जिस तरह बात उठी, क्या हम उस दिशा में आगे बढ़ पाए। उस प्रशासनिक सुधार की दिशा में काम हो पाया? आज भी इसके लिए प्रशासनिक सुधार बहुत बड़ी चुनौती है।

नोएडा में हुई युवक की मौत एक व्यक्ति की त्रासदी भर नहीं है। यह उस भरोसे की मौत है, जो नागरिक और सिस्टम के बीच होना चाहिए। यदि यह भरोसा बहाल नहीं हुआ, तो विकास के सारे दावे खोखले साबित होंगे। सवाल अब यह नहीं है कि अगला हादसा कहां होगा।

सवाल यह है कि हम गणतंत्र भारत के आज 77वें पड़ाव पर हैं और विकसित भारत की हूक हमें आगे बढ़ने को प्रेरित करती है, पर क्या उससे पहले हम सिस्टम को भी जगा पाएंगे या फिर विकसित होने की लालसा में हम वैसे ही जान गंवाते रहेंगे? जागना तो समाज को भी होगा अपने संवैधानिक मौलिक कर्तव्यों के प्रति निर्वहन के लिए यदि हम अपने मौलिक कर्तव्यों के प्रति कृतज्ञ रहेंगे तो विकसित भारत नुमा सोने की चिड़िया उनमुक्त गगन में निडर उड़ान भर पाएगी।
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